मैनपुर – गरियाबंद जिले के देवभोग में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां भगवान जगन्नाथ अकेले विराजे हैं। राज्य में ऐसा मंदिर कहीं और नहीं है। मंदिर और यहां की मान्यताएं भी काफी रोचक हैं और लोगों की आस्था की अभिव्यक्ति करती हैं। करीब सवा सौ साल पहले स्थापित इस मंदिर को बनाने में 46 साल लगे। बेल का गुदा, चिवड़ा, मुर्रा और रेगटा (एक विशेष प्रकार के पत्थर) का चूर्ण पीसकर मंदिर का निर्माण शुरू स्थापना हुई तब आसपास के 84 गांवों ने शपथ ली थी कि पुरी में विराजे श्री जगन्नाथजी को वे हर साल का पूरा भोग भेजेंगे।
यह परंपरा आज भी कायम है और इसी परंपरा के कारण देवभोग नाम पड़ा। देवभोग के इस अनोखे मंदिर की आधारशिला 1854 में तात्कालिक मालगुजार रामचंद्र बेहेरा द्वारा रखी गई और बलभद्र बेहरा द्वारा पूर्ण की गई। तब इन्हीं पूरे 84 गावों के लोगों ने श्रमदान करने के साथ ही बेल का गुदा, चिवड़ा, मुर्रा और रेगटा (एक विशेष प्रकार के पत्थर) का चूर्ण पीसकर मंदिर का निर्माण शुरू किया, जो 46 वर्षों की अथक मेहनत के बाद जाकर पूर्ण हुआ। इसके बाद 1901 में पहली बार नेत्रोत्सव के साथ ही भगवान की रथयात्रा देवभोग में निकाली गई। जो आज भी विधि-विधान के साथ लगातार जारी है।
भगवान को देते हैं लगान
पुराने जमाने में राजा महाराजाओं और अंग्रेज लगान वसूलते थे। मौजूदा समय में सरकारें टैक्स वसूलती हैं। देवभोग में विराजे भगवान जगन्नाथ आज भी उन 84 गांव के लोगों से लगान वसूलते हैं। लगान देने की ये परंपरा 125 साल से निरंतर चली आ रही है। लगान के रूप में चावल और मूंग लिया जाता है। यहां से वसूला गया लगान ओडिशा के पुरी के विश्व प्रसिद् भगवान जगन्नाथ मंदिर जाता है और फिर उसी सुगंधित चावल और मूंग का भोग पुरी के जगन्नाथ मंदिर में लगाया जाता है। बता दें कि भक्त खुद ही अपने स्वेच्छा से यहां लगान भरने आते हैं। इन पर कोई दबाव नहीं डाला जाता है।
मंदिर की स्थापना की कहानी
मंदिर की स्थापना की कहानी भी दिलचस्प है। 18वीं शताब्दी में टेमरा गांव के रामचंद्र बेहेरा तीर्थ यात्रा से लौटते वक्त पुरी से भगवान जगन्नाथ की मूर्ति साथ लाए थे। उन्होंने मूर्ति को झराबहाल गांव के एक पेड़ के नीचे स्थापित कर पूजा शुरू की। जब यह बात तत्कालीन जमींदारों तक पहुंची तो उन्होंने मूर्ति की शक्ति की परीक्षा एक सभा में की। बताते हैं कि परिणाम चौंकाने वाले थे, जिसके बाद उन्होंने मंदिर निर्माण का निर्णय लिया। 1854 में मंदिर निर्माण शुरू हुआ और 1901 में जाकर पूर्ण हुआ। तबसे यहां धूमधान से नेत्रोत्सव और रथयात्रा का पर्व मनाया जाता है।
चार पीढ़ीयों से कर रहे सेवा
देवभोग मंदिर में सेवा की जिम्मेदारी झराबहाल गांव के यादव परिवार को सौंपी गई थी। यह परिवार पिछले चार पीढ़यिों से मंदिर में सेवक (चाकर) के रूप में भगवान की सेवा में जुटा है। पुजारी के साथ मिलकर ये सेवक पूरे क्षेत्र में घूम-घूमकर लगान वसूलते हैं।
एकल विग्रह वाला दुर्लभ मंदिर
देवेंद्र बेहेरा ने बताया कि, इस मंदिर की सबसे अनूठी पहचान यह है कि यहां भगवान जगन्नाथ का एकल विग्रह स्थापित है। सामान्यतः जगन्नाथ मंदिरों में भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ तीनों की प्रतिमाएं एक साथ विराजमान रहती हैं, लेकिन देवभोग के इस प्राचीन मंदिर में केवल भगवान जगन्नाथ की ही प्रतिमा स्थापित है।
पुरी रथयात्रा के लिए तैयार, सरकार ‘हाई अलर्ट’ पर
पुरी ओडिशा में समुद्र के किनारे बसे पुरी शहर में गुरुवार को भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन की वार्षिक रथ यात्रा के लिए तीन शानदार लकड़ी के रथ ‘ग्रैंड रोड’ पर निकलने को तैयार हैं। इस बड़े आयोजन के सुचारू संचालन के लिए राज्य सरकार हाई अलर्ट पर है। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने घोषणा की कि तीनों रथों – भगवान बलभद्र के ‘तालध्वज’, देवी सुभद्रा के ‘दर्पदलन और भगवान जगन्नाथ के ‘नंदीघोष’ का निर्माण और सजावट पूरी हो गई है।