बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुधवार को दो अहम मामलों में महत्वपूर्ण आदेश जारी किए। एक ओर कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम में पदोन्नति के नियम बदलने के फैसले को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया, वहीं दूसरी ओर राज्य में साइबर अपराध मामलों की जांच के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य विशेषज्ञ (Cyber Expert) की नियुक्ति चार सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।
वन विकास निगम में पदोन्नति नियम बदलने पर लगी रोक
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी सेवा नियम में संशोधन किए बिना केवल प्रशासनिक आदेश के आधार पर पदोन्नति का मापदंड नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ‘सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी’ की जगह ‘मेरिट-कम-सीनियरिटी’ लागू करना नियमों के विपरीत है।
यह फैसला जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ ने विनीत कुमार सिंह समेत अन्य प्रोजेक्ट रेंज अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनाया।
याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा था?
याचिकाकर्ताओं ने 16 अप्रैल 2026 को वन विकास निगम के प्रस्ताव और 12 जून 2026 को राज्य सरकार की प्रशासनिक स्वीकृति को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि वे वर्ष 2017 में प्रत्यक्ष भर्ती के माध्यम से प्रोजेक्ट रेंज अधिकारी नियुक्त हुए थे और वर्ष 2022 से पदोन्नति के पात्र हैं।
उन्होंने दलील दी कि सेवा विनियम, 1984 के अनुसार पदोन्नति का आधार सीनियरिटी-कम-सूटेबिलिटी है, जबकि प्रशासनिक आदेश के जरिए इसे बदलकर मेरिट-कम-सीनियरिटी कर दिया गया, जो कानून के अनुरूप नहीं है।
साइबर एक्सपर्ट की भर्ती पर भी कोर्ट सख्त
एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य में साइबर अपराधों की जांच के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य विशेषज्ञों की कमी पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस एक्सपर्ट की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर अगली सुनवाई से पहले रिपोर्ट पेश करें।
राज्य में नहीं है इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य विशेषज्ञ
याचिका में बताया गया कि देश के कई राज्यों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के विशेषज्ञ नियुक्त किए जा चुके हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में अब तक इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं हुई है। इससे साइबर अपराधों की जांच और डिजिटल साक्ष्यों की प्रमाणिकता से जुड़े मामलों में कठिनाइयां सामने आ रही हैं।
कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान समय में साइबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में आईटी अधिनियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच के लिए योग्य विशेषज्ञों की उपलब्धता बेहद आवश्यक है। अदालत ने इसे सार्वजनिक हित से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में देरी पर चिंता व्यक्त की।