कांकेर। लारगांव मरकाटोला में भालू के हमले की दर्दनाक घटना ने केवल दो लोगों की जान ही नहीं ली, बल्कि एक गरीब परिवार की पूरी जिंदगी को संकट में डाल दिया। जिस घर की रोजी-रोटी भाई की खेती-बाड़ी और बहन की नौकरी से चलती थी, उसी घर के दोनों कमाऊ सदस्य एक ही दिन में काल के गाल में समा गए। अब प्रधानमंत्री आवास योजना से बने उस छोटे से घर में मातम पसरा है। छह सदस्यीय परिवार के सामने आजीविका, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को लेकर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
लारगांव मरकाटोला के बड़पारा निवासी हलालराम जुर्री परिवार के मुख्य सहारा थे। वे खेती-किसानी के साथ मवेशियों की देखभाल कर घर का खर्च चलाते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और लगन से अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। उनकी बहन स्थानीय आश्रम में कार्यरत थीं और अपनी आय से घर की आर्थिक जिम्मेदारी में बराबर की भागीदार थीं। दोनों की कमाई से परिवार किसी तरह अपना जीवनयापन कर रहा था। लेकिन एक ही दिन में दोनों की मौत ने पूरे परिवार को असहाय बना दिया। परिवार का आशियाना प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बना हुआ है। यह मकान अब भी खड़ा है, लेकिन उसे बसाने वाले दो मजबूत सहारे हमेशा के लिए छिन गए हैं।
घर में सात सदस्य
भालू के शिकार हुए हलालराम जुरी के परिवार में अब सात सदस्य बचे हैं, जिनमें हलालराम की वृद्ध मां, पत्नी सरोज जुरीं, दो बेटियां चित्रलेखा जुरीं और चंद्रलेखा जुरी, तथा दो जुड़वा बेटे लव कुमार जुरी और कुश कुमार जुरी शामिल हैं। इसके अलावा एक बुआ है, जो भालू के हमले से घायल हुई थी और उनका इलाज रायपुर में जारी है। दोनो बेटियां 2024 में बारहवीं मरकाटोला स्कूल से पास किया था, वहीं दोनो जुड़वा बेटे नरहरदेव स्कूल में दसवीं में पढ़ रहे हैं और छात्रावास कांकेर में ही रहते है।
परिजनों का हाल बेहाल
घटना के बाद परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। वृद्ध मां अपने बेटे और बेटी को खोने के दुख से बार-बार बेसुध हो रही हैं, जबकि पत्नी सरोज जुरीं अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। गांव की महिलाएं और परिजन उन्हें ढाढस बंधाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इस अपूरणीय क्षति की भरपाई संभव नहीं है।
मरकाटोला गांव का माहौल गमगीन
इस दर्दनाक हादसे के बाद पूरे मरकाटोला गांव में शोक की लहर है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल से लगे क्षेत्रों में भालुओं की बढ़ती गतिविधियों के कारण लोगों में लगातार भय का माहौल बना हुआ है। खेतों और जंगलों में काम करने जाने वाले ग्रामीण हर दिन जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं। लोगों ने वन विभाग से वन्यजीवों की निगरानी बढ़ाने और प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के प्रभावी इंतजाम करने की मांग की है।