हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी के छात्रों के एनरोलमेंट विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई हुई। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कदम पर सवाल उठाते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में NALSAR के छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने BCI के उस सर्कुलर पर नाराजगी जताई, जिसमें विश्वविद्यालय के 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स के एनरोलमेंट को रोकने का निर्देश दिया गया था।
CJI ने कहा कि अगर छात्र कानून के दायरे में रहते हुए अपनी बात रख रहे हैं, तो उन्हें अपनी आवाज उठाने का अधिकार है। उन्होंने अपने छात्र जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि वह खुद भी विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते रहे हैं।
क्या है NALSAR का पूरा विवाद?
मामला NALSAR यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 450 छात्रों ने CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था।
छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र भेजकर CJI को दिया गया निमंत्रण वापस लेने की मांग की थी। छात्रों का विरोध CJI की कुछ हालिया टिप्पणियों से जुड़ा बताया गया, जिन्हें उन्होंने प्रदर्शनकारियों से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों के रूप में देखा था।
BCI ने पहले क्या आदेश दिया था?
विवाद के बीच BCI ने 13 अगस्त को सभी State Bar Councils को निर्देश दिया था कि NALSAR के 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स का एडवोकेट के तौर पर Enrolment अगले आदेश तक नहीं किया जाए।
इसके साथ ही BCI ने NALSAR के वाइस चांसलर से तीन दिन के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट भी मांगी थी। परिषद यह जानना चाहती थी कि कथित विरोध अभियान शुरू करने, उसे आयोजित करने, उसका समन्वय करने या छात्रों को इसमें शामिल करने में किन लोगों की भूमिका थी।
कुछ ही घंटों में BCI ने बदला फैसला
BCI के शुरुआती फैसले के बाद विवाद बढ़ गया। इसके बाद परिषद ने उसी दिन अपने आदेश में बदलाव कर दिया।
BCI ने माना कि 2026 बैच के ज्यादातर छात्र निर्दोष हैं और उन्हें किसी अन्य व्यक्ति की कथित गलती या भूमिका के लिए नुकसान नहीं उठाना चाहिए। संशोधित फैसले के बाद NALSAR के 2026 बैच के सभी छात्र अपनी पसंद की State Bar Council में Enrolment के लिए आवेदन कर सकते हैं।
हालांकि, विश्वविद्यालय से मांगी गई तथ्यात्मक रिपोर्ट को लेकर जांच की प्रक्रिया जारी रखने की बात कही गई थी। बाद में BCI ने 2026 बैच के खिलाफ अपनी कार्यवाही बंद करने की जानकारी दी और कहा कि छात्रों की किसी कथित गड़बड़ी या आंदोलन में भूमिका सामने नहीं आई।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी जताई थी आपत्ति
BCI के शुरुआती आदेश पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने भी सवाल उठाए थे।
उन्होंने BCI के कदम को मनमाना और जरूरत से ज्यादा कार्रवाई बताते हुए कहा था कि छात्रों को अपनी राय या विरोध व्यक्त करने के कारण वकालत के पेशे में प्रवेश से वंचित करने की स्थिति नहीं बननी चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने BCI को नोटिस जारी कर इस पूरे मामले पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की टिप्पणियों से यह स्पष्ट संकेत मिला कि अदालत छात्रों के शांतिपूर्ण तरीके से अपनी राय रखने के अधिकार को गंभीरता से देख रही है। अब BCI के जवाब और मामले से जुड़े अन्य तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट आगे की दिशा तय करेगा।