जुलाई 2026 में थोक महंगाई दर में मामूली राहत देखने को मिली है। सरकार की ओर से 14 अगस्त को जारी आंकड़ों के मुताबिक, WPI यानी थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर जुलाई में 9.78% रही, जबकि जून में यह 9.87% थी। यानी एक महीने में थोक महंगाई दर में 0.09 प्रतिशत की मामूली कमी दर्ज की गई।
हालांकि, महंगाई दर में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि सामान सस्ता हो गया है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार पिछले महीने की तुलना में थोड़ी धीमी हुई है।
उदाहरण के तौर पर, अगर पिछले साल किसी सामान की थोक कीमत 100 रुपये थी और इस साल WPI के हिसाब से उसमें 9.78% की बढ़ोतरी हुई है, तो उसकी कीमत करीब 109.78 रुपये हो सकती है। यानी कीमतें अब भी बढ़ रही हैं, सिर्फ उनकी रफ्तार में मामूली कमी आई है।
खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ी
जुलाई में फूड इंडेक्स महंगाई के मोर्चे पर चिंता का कारण बना रहा। WPI फूड इंडेक्स में जुलाई में महंगाई दर 6.65% रही, जबकि जून में यह 6.14% थी।
इस इंडेक्स में प्राइमरी आर्टिकल्स के तहत आने वाली खाद्य वस्तुओं के साथ-साथ मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स में शामिल पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड भी आते हैं।
कच्चे माल और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी
प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई दर जून के 7% से बढ़कर जुलाई 2026 में 8.52% हो गई।
इस कैटेगरी में सब्जियां, अनाज और अन्य कच्चे माल जैसी वस्तुएं शामिल हैं। इनकी थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर आगे चलकर खुदरा बाजार और घरेलू बजट पर भी पड़ सकता है।
अगर सब्जियों, अनाज, दूध और दालों जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतें थोक स्तर पर बढ़ती हैं, तो कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है और इसका असर उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
ईंधन और बिजली में मिली कुछ राहत
जुलाई में Fuel & Power सेक्टर में महंगाई की रफ्तार जरूर धीमी हुई है। इसकी महंगाई दर जून के 27.41% से घटकर जुलाई में 20.05% पर आ गई।
पेट्रोल, डीजल, गैस और बिजली जैसी ऊर्जा संबंधी लागतों में नरमी का असर ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत पर पड़ सकता है। ईंधन की लागत घटने से माल ढुलाई और कंपनियों की परिचालन लागत पर दबाव कुछ कम हो सकता है।
हालांकि, इसका सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं तक कितनी तेजी से पहुंचेगा, यह बाजार की अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स भी हुए महंगे
फैक्ट्रियों में तैयार होने वाले सामानों की थोक महंगाई दर भी जुलाई में बढ़ी। यह जून के 7.48% से बढ़कर 8.29% हो गई।
इस कैटेगरी में कपड़े, पैकेज्ड फूड, साबुन, तेल, बर्तन, वाहन और इलेक्ट्रॉनिक सामान समेत कई उत्पाद शामिल होते हैं।
WPI में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का वजन सबसे ज्यादा है। ऐसे में इस क्षेत्र में कीमतों की बढ़ोतरी थोक महंगाई के कुल आंकड़े पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है।
WPI में तीन प्रमुख हिस्से
थोक मूल्य सूचकांक को मुख्य रूप से तीन प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है:
- Primary Articles: 22.62% वेटेज
- Fuel & Power: 13.15% वेटेज
- Manufactured Products: 64.23% वेटेज
Primary Articles के अंतर्गत Food Articles, Non-Food Articles, Minerals और Crude Petroleum जैसी श्रेणियां आती हैं।
लंबे समय तक ऊंची WPI से क्या असर?
अगर थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो इसका असर उत्पादन और कारोबारी लागत पर पड़ सकता है। कंपनियों के लिए कच्चा माल, ऊर्जा और परिवहन महंगा होने पर वे अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकती हैं।
खास तौर पर मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर और अन्य औद्योगिक कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर तैयार उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है।
सरकार टैक्स और अन्य नीतिगत उपायों के जरिए कुछ हद तक लागत का दबाव कम कर सकती है। उदाहरण के तौर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के दौरान ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
WPI और Retail Inflation में क्या अंतर?
भारत में महंगाई को मुख्य रूप से Retail Inflation और Wholesale Inflation के जरिए देखा जाता है।
Retail Inflation यानी खुदरा महंगाई Consumer Price Index (CPI) पर आधारित होती है। यह उन कीमतों को दर्शाती है, जिनका भुगतान आम उपभोक्ता सामान और सेवाएं खरीदते समय करता है।
वहीं Wholesale Price Index (WPI) थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को मापता है। यानी यह उन कीमतों से जुड़ा है, जिन पर थोक बाजार में कारोबारी एक-दूसरे से सामान खरीदते या बेचते हैं।
WPI में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी करीब 64% है, जबकि Primary Articles का वजन 22.62% और Fuel & Power का 13.15% है। दूसरी ओर, CPI में खाद्य वस्तुओं का वजन काफी अधिक है, इसलिए आम परिवार की रोजमर्रा की महंगाई को समझने के लिए खुदरा महंगाई भी बेहद महत्वपूर्ण होती है।
कुल मिलाकर, जुलाई में थोक महंगाई में मामूली गिरावट जरूर आई है, लेकिन खाद्य वस्तुओं और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं। आने वाले महीनों में कच्चे माल, ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों की दिशा महंगाई के रुख को तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।