Vande Mataram Controversy: कांग्रेस के कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो अंतरे गाए जाने के फैसले को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कांग्रेस के इस निर्णय की आलोचना करते हुए इसे तुष्टीकरण की राजनीति बताया। उन्होंने कहा कि देश में अब तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी।
अमित शाह ने दावा किया कि कांग्रेस ने 1937 में वंदे मातरम को लेकर फैसला किया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजादी के 80 साल बाद उस फैसले को सुधारने का काम किया है।
कांग्रेस ने लिया दो अंतरे गाने का फैसला
कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने बुधवार को निर्णय लिया था कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएंगे। वंदे मातरम में कुल छह अंतरे बताए जाते हैं।
इस फैसले के बाद भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधना शुरू कर दिया। अमित शाह ने इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस के पुराने फैसलों पर भी सवाल उठाए।
नितिन नबीन ने भी कांग्रेस पर साधा निशाना
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी कांग्रेस के फैसले की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति के लिए राष्ट्रीय गीत का अपमान कर रही है। उन्होंने कांग्रेस की तुलना ‘नई मुस्लिम लीग’ से भी की।
नबीन ने कहा कि वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है और इसके साथ किसी भी तरह का विवाद शहीदों के सम्मान से जुड़ा विषय है।
15 अगस्त के कार्यक्रम के बाद शुरू हुआ विवाद
वंदे मातरम को लेकर मौजूदा विवाद की शुरुआत 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में हुए स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के बाद हुई। भाजपा ने आरोप लगाया था कि कार्यक्रम के दौरान पूरा वंदे मातरम गाए जाने पर सोनिया गांधी ने इसे रोकने का संकेत दिया।
भाजपा ने कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा था।
हालांकि, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इन आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम को रोकने की कोई कोशिश नहीं हुई थी। उनके मुताबिक सोनिया गांधी काफी देर से खड़ी थीं और उन्होंने बैठने के लिए कुर्सी मंगाने का संकेत दिया था।
कांग्रेस ने 1937 के फैसले का दिया हवाला
जयराम रमेश ने कहा कि 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में वंदे मातरम के इस्तेमाल पर चर्चा हुई थी। इस बैठक में महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और जवाहरलाल नेहरू समेत कई प्रमुख नेता मौजूद थे।
कांग्रेस के मुताबिक, रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह के आधार पर कांग्रेस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम की शुरुआती पंक्तियों के इस्तेमाल की परंपरा तय हुई थी और इसके बाद से पार्टी के कार्यक्रमों में इन्हीं पंक्तियों का इस्तेमाल होता रहा है।
वंदे मातरम को लेकर नए नियमों का भी जिक्र
वंदे मातरम पर विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय गीत के गायन और प्रोटोकॉल को लेकर नए निर्देश जारी किए गए हैं। निर्देशों में वंदे मातरम और राष्ट्रगान दोनों होने की स्थिति में पहले वंदे मातरम और उसके बाद ‘जन गण मन’ के गायन का प्रावधान बताया गया है।
वहीं, दोनों के साथ किसी राज्य का आधिकारिक गीत होने पर पहले राज्य गीत, फिर वंदे मातरम और अंत में राष्ट्रगान का क्रम रखा गया है।
बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था वंदे मातरम
‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 19वीं सदी में की थी। बाद में यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सार्वजनिक रूप से गाया था।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम’ देशभक्ति और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का प्रमुख नारा बन गया था।
संसद में भी हो चुकी है वंदे मातरम पर चर्चा
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर संसद में भी इस विषय पर विशेष चर्चा हो चुकी है। उस दौरान भाजपा और कांग्रेस के बीच इसे लेकर राजनीतिक मतभेद सामने आए थे।
भाजपा ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने पर सवाल उठाए थे। अब कांग्रेस के कार्यक्रमों में दो अंतरे गाने के फैसले के बाद एक बार फिर ‘वंदे मातरम’ पर सियासी घमासान शुरू हो गया है।