बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर के सरकंडा थाना क्षेत्र में NDPS एक्ट के तहत दर्ज एक मामले की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने खास तौर पर पूछा कि जिस पुलिस अधिकारी ने मामले में FIR दर्ज कराई, उसी को जांच अधिकारी कैसे नियुक्त किया गया।
हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर स्पष्टीकरण मांगते हुए DGP से शपथपत्र के जरिए जवाब प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी।
महिला के घर से 2925 क्लोनाजेपाम टैबलेट बरामद करने का दावा
मामला सरकंडा थाना क्षेत्र के बंधवापारा का है। पुलिस के अनुसार, एक महिला के घर पर दबिश के दौरान 2925 क्लोनाजेपाम (रिवोट्रिल) टैबलेट बरामद की गई थीं।
पुलिस ने इन दवाओं को प्रतिबंधित और नशीली बताते हुए महिला के खिलाफ NDPS एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इसके बाद महिला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
परिजनों के मुताबिक, महिला करीब सात महीने से जेल में है और इस दौरान उसकी बच्ची तथा परिवार को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
भाई ने लगाया साजिश का आरोप
महिला के भाई ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि उसकी बहन को सरकंडा पुलिस और उसके बहनोई रामकिशोर ने कथित साजिश के तहत फंसाया है।
उसने मामले में ASI शैलेंद्र सिंह की कथित भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और मामले में अंतिम स्थिति कोर्ट के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
परिवार का दावा- छत पर मिला था दवाओं से भरा बैग
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि जिस पॉलिथीन बैग से कथित प्रतिबंधित दवाएं मिली थीं, वह महिला के पास से सीधे बरामद नहीं हुआ था।
परिवार के मुताबिक, करीब 14 साल के बच्चे को पतंग उड़ाते समय यह बैग घर की छत पर मिला था। बच्चे ने मोबाइल से दवाओं के बारे में जानकारी लेने के बाद अपनी मां को इसकी जानकारी दी।
परिवार का दावा है कि बैग को अनचाही वस्तु समझकर सीढ़ियों के पास कचरे की तरह रख दिया गया था। बाद में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए महिला को आरोपी बना दिया।
नाबालिग को 10 घंटे थाने में बैठाने का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में यह भी आरोप लगाया कि 14 वर्षीय बच्चे के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं थी। इसके बावजूद पुलिस उसे थाने ले गई और करीब 10 घंटे तक वहां बैठाए रखा गया।
याचिकाकर्ताओं ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
हाईकोर्ट ने पूछा- बैग छत तक कैसे पहुंचा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से मांग की गई है कि जांच में यह पता लगाया जाए कि दवाओं से भरा बैग आखिर छत तक कैसे पहुंचा और उसे वहां किसने रखा था।
इसके साथ ही दवाओं के वास्तविक स्रोत, महिला की गिरफ्तारी की परिस्थितियों और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। बच्चे के मोबाइल फोन को फोरेंसिक जांच के लिए इस्तेमाल किए जाने की मांग भी सामने रखी गई है।
FIR के बाद उसी अधिकारी को जांच क्यों?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया को लेकर सबसे अहम सवाल उठाया।
कोर्ट के सामने बताया गया कि पुलिस अधिकारी ASI शैलेंद्र सिंह ने कथित तौर पर देहाती नालिश दर्ज की थी और उसी के आधार पर FIR दर्ज हुई। इसके बाद इसी अधिकारी को मामले की जांच भी सौंप दी गई।
बताया गया कि जांच पूरी करने के बाद इसी अधिकारी ने महिला के खिलाफ चार्जशीट भी पेश की।
इसी बिंदु पर हाईकोर्ट ने सवाल किया कि शिकायत/FIR की प्रक्रिया में शामिल अधिकारी को ही जांच अधिकारी की जिम्मेदारी कैसे दी गई। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर पुलिस से जवाब मांगा है।
ASI शैलेंद्र सिंह के पुराने रिकॉर्ड की भी जानकारी मांगी
डिवीजन बेंच ने DGP को मामले के जांच अधिकारी ASI शैलेंद्र सिंह के पिछले आचरण और सेवा रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी भी पेश करने का निर्देश दिया है।
इससे मामले में पुलिस की भूमिका और जांच की निष्पक्षता को लेकर उठे सवालों की गंभीरता बढ़ गई है।
अब 24 अगस्त को होने वाली सुनवाई में DGP का शपथपत्र महत्वपूर्ण रहेगा। इसके बाद हाईकोर्ट मामले में आगे की दिशा तय कर सकता है।
क्या होती है देहाती नालिश?
देहाती नालिश अपराध की शुरुआती सूचना या बयान होता है, जिसे घटना स्थल या थाने पहुंचने से पहले पुलिस अधिकारी के सामने दर्ज कराया जा सकता है। इसी प्रारंभिक सूचना के आधार पर आगे FIR दर्ज की जा सकती है।
इस मामले में इसी शुरुआती शिकायत दर्ज करने वाले अधिकारी को बाद में जांच की जिम्मेदारी दिए जाने पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाया है। हालांकि, जांच प्रक्रिया की वैधानिकता और मामले के अंतिम तथ्यों पर फैसला अदालत की आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगा।