नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिलों में आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर वैज्ञानिकों ने अहम खुलासा किया है। शुरुआती तौर पर इस आपदा को अत्यधिक मानसूनी बारिश या बादल फटने से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों और रिमोट सेंसिंग डेटा के विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि बाढ़ के पीछे लांगतांग लिरुंग पर्वत क्षेत्र में हुआ भीषण ग्लेशियल एवलांच बड़ी वजह था।
वैज्ञानिक विश्लेषण के मुताबिक, 7,227 मीटर ऊंची लांगतांग लिरुंग चोटी के ऊपरी हिस्से में बड़े पैमाने पर बर्फ, चट्टानों और मलबे के खिसकने की घटना हुई। इसके बाद भारी मात्रा में मलबा संकरी घाटी में पहुंचा और नदी के बहाव को रोकते हुए एक अस्थायी प्राकृतिक बांध जैसा अवरोध बन गया।
ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर घाटी में गिरा
सैटेलाइट इमेजरी से पता चला कि पर्वत की खड़ी ढलानों पर मौजूद लटकते ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूट गया। इसके साथ बर्फ, भारी बोल्डर, मिट्टी और चट्टानी मलबा तेज गति से नीचे की ओर आया।
इतनी बड़ी मात्रा में मलबा नदी के ऊपरी हिस्से में जमा होने से पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो गया। इसके पीछे लगातार पानी जमा होता गया और एक अस्थायी झील जैसी स्थिति बन गई।
प्राकृतिक बांध टूटा और आई प्रलयंकारी फ्लैश फ्लड
पानी का दबाव बढ़ने के बाद मलबे और बर्फ से बना यह अस्थायी अवरोध ज्यादा देर तक टिक नहीं सका। अचानक इसके टूटने से बड़ी मात्रा में पानी बेहद तेज रफ्तार से नीचे की घाटियों की ओर बह निकला।
इस फ्लैश फ्लड में पानी के साथ भारी चट्टानें और मलबा भी बहा। इससे भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटी में व्यापक तबाही हुई। रास्ते में आने वाले पुल, सड़कें, बाजार और जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े ढांचे बुरी तरह प्रभावित हुए।
सिर्फ बारिश को जिम्मेदार मानना सही नहीं
इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ के पीछे सिर्फ बारिश ही जिम्मेदार नहीं होती। ग्लेशियर टूटना, हिमस्खलन, भूस्खलन और प्राकृतिक बांध का अचानक टूटना भी बड़े पैमाने पर फ्लैश फ्लड पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ और चट्टानों की अस्थिरता बढ़ने से ऐसी घटनाओं का जोखिम गंभीर हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही ग्लेशियरों की अस्थिरता
वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ता वैश्विक तापमान हिमालयी ग्लेशियरों के संतुलन को प्रभावित कर रहा है। तापमान में बदलाव, बर्फ के पिघलने और चरम मौसम की घटनाओं के कारण कई ऊंचाई वाले ग्लेशियर अधिक संवेदनशील हो रहे हैं।
लांगतांग क्षेत्र पहले से ही भूकंपीय गतिविधियों और बदलते मौसम के प्रभावों के प्रति संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में ग्लेशियल एवलांच या अचानक ग्लेशियर टूटने की घटनाएं निचले इलाकों के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं।
24 घंटे निगरानी की जरूरत
वैज्ञानिकों ने हिमालयी नदी घाटियों में ग्लेशियरों और संभावित एवलांच जोन की लगातार निगरानी पर जोर दिया है। सैटेलाइट इमेजरी, रडार सिस्टम और आधुनिक अर्ली वार्निंग तकनीक की मदद से संवेदनशील क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का समय रहते पता लगाया जा सकता है।
ऐसी निगरानी से नदी किनारे बसे कस्बों, पुलों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को अचानक आने वाली बाढ़ से पहले अलर्ट करने में मदद मिल सकती है।