गुरुघासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व: छत्तीसगढ़ का गुरुघासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व देश के सबसे बड़े टाइगर रिजर्व में शामिल है, लेकिन बाघों की सुरक्षा और संरक्षण से जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। टाइगर रिजर्व में बाघों के लिए पर्याप्त प्रे-बेस (शिकार आधार) उपलब्ध नहीं है। वहीं, फील्ड स्टाफ की कमी और सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है।
इसी बीच बाघों की संख्या बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। बारिश खत्म होने के बाद मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से तीन मादा बाघों को ट्रांसलोकेट कर गुरुघासीदास टाइगर रिजर्व लाने की तैयारी है। इसके लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी NTCA से अनुमति भी मिल चुकी है।
तीन टाइगर रिजर्व के बीच अहम कॉरिडोर
गुरुघासीदास टाइगर रिजर्व की भौगोलिक स्थिति इसे बाघों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। इसके पश्चिम-उत्तर दिशा में मध्य प्रदेश का संजय डुबरी टाइगर रिजर्व और पश्चिम में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व स्थित है। वहीं, पूर्वी दिशा में झारखंड का पलामू टाइगर रिजर्व है।
संजय डुबरी और बांधवगढ़ से आने-जाने वाले बाघों के लिए गुरुघासीदास एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर की भूमिका निभाता है। इसी वजह से यह क्षेत्र बाघ संरक्षण की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।
ऐसे में यहां नए बाघों को बसाने की योजना के साथ उनके लिए पर्याप्त भोजन, सुरक्षित आवास और निगरानी व्यवस्था उपलब्ध कराना भी बड़ी चुनौती है।
प्रे-बेस की कमी से बढ़ रहा मानव-बाघ संघर्ष
टाइगर रिजर्व के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक प्रे-बेस की कमी बताई जा रही है। जंगल में प्राकृतिक शिकार पर्याप्त नहीं होने के कारण बाघ कई बार भोजन की तलाश में आसपास के इलाकों में मौजूद पालतू मवेशियों का शिकार कर लेते हैं।
इससे ग्रामीणों और बाघों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें मवेशियों का शिकार करने के बाद बाघों को जहर देकर मारने की घटनाएं हुईं।
2022 में दो बाघों की मौत
वर्ष 2022 में ऐसे दो मामले सामने आए थे। बताया गया कि बाघ द्वारा मवेशी का शिकार किए जाने के बाद एक मवेशी मालिक ने अपने मवेशी में कीटनाशक दवा डाल दी। मवेशी खाने के बाद बाघ की मौत हो गई।
इसके अलावा नवंबर 2024 में भी एक बाघ के जहर देकर मारे जाने का मामला सामने आया था। इस घटना के पीछे भी मवेशी के शिकार को वजह बताया गया था।
ये घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि बाघों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक शिकार उपलब्ध कराना और ग्रामीण क्षेत्रों में मानव-बाघ संघर्ष को कम करना बेहद जरूरी है।
2 साल बाद भी करीब 40% फील्ड स्टाफ की कमी
गुरुघासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल करीब 2,829.387 वर्ग किलोमीटर है। वर्ष 2024 में इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला था। इसके बाद उम्मीद थी कि बाघों की सुरक्षा के लिए आवश्यक फील्ड स्टाफ और संसाधनों को मजबूत किया जाएगा।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दो साल बाद भी जरूरी मानव संसाधन की कमी बनी हुई है। पुराने स्वीकृत सेटअप में 84 वनपाल और वनरक्षक के पदों की व्यवस्था थी, जबकि वर्तमान में करीब 52 फील्ड स्टाफ ही उपलब्ध हैं।
इस हिसाब से पुराने स्वीकृत सेटअप के मुकाबले लगभग 40 फीसदी फील्ड स्टाफ की कमी बताई जा रही है।
कोर और बफर जोन की सुरक्षा भी चुनौती
समस्या सिर्फ कर्मचारियों की संख्या तक सीमित नहीं है। उपलब्ध फील्ड स्टाफ में से भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों की ड्यूटी कोर और बफर जोन की बजाय मैदानी क्षेत्रों में लगी हुई है।
ऐसे में इतने बड़े क्षेत्र में बाघों की लगातार निगरानी, अवैध शिकार पर नियंत्रण और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। टाइगर रिजर्व घोषित होने के बावजूद सुरक्षा से जुड़े पर्याप्त इंतजाम नहीं होने को लेकर चिंता जताई जा रही है।
बारनवापारा से लाया गया बाघ भी संजय डुबरी में ज्यादा रहा
गुरुघासीदास में बाघों की आबादी बढ़ाने के लिए पहले भी एक प्रयोग किया जा चुका है। करीब दो साल पहले नवंबर 2024 में बारनवापारा अभयारण्य से एक नर बाघ को रेस्क्यू कर गुरुघासीदास टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया था।
हालांकि, इस ट्रांसलोकेट किए गए बाघ को गुरुघासीदास में अपेक्षित रूप से स्थायी ठिकाना नहीं मिला। बताया जा रहा है कि वह ज्यादातर समय मध्य प्रदेश के संजय डुबरी टाइगर रिजर्व में ही रह रहा है।
गुरुघासीदास में उसकी आवाजाही कभी-कभार ही देखने को मिलती है। संजय डुबरी मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित प्रमुख वन्यजीव क्षेत्र है और गुरुघासीदास के साथ इसका महत्वपूर्ण कनेक्शन भी है।
अचानकमार में छोड़ी गई बाघिन ने बढ़ाया कुनबा
दूसरी तरफ, वर्ष 2023 में सूरजपुर जिले के ओड़गी ब्लॉक में घायल अवस्था में मिली एक मादा बाघ को जंगल सफारी में उपचार के बाद अचानकमार टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया था।
इस बाघिन के मामले में संरक्षण की तस्वीर काफी सकारात्मक रही। बाघिन ने वहां शावकों को जन्म दिया। इसके बाद उसकी एक मादा संतान वयस्क हुई और हाल के दिनों में उसने भी तीन शावकों को जन्म दिया है।
इस उदाहरण से उम्मीद जगी है कि सही आवास, पर्याप्त भोजन और सुरक्षित वातावरण मिलने पर बाघों का प्राकृतिक रूप से कुनबा बढ़ाया जा सकता है।
तीन बाघिनों के आने से क्या बदलेगा?
अब बांधवगढ़ से तीन मादा बाघों को गुरुघासीदास लाने की योजना है। NTCA की अनुमति मिलने के बाद बारिश के बाद यह ट्रांसलोकेशन किए जाने की तैयारी है।
हालांकि, इस योजना की सफलता केवल बाघिनों को यहां लाने पर निर्भर नहीं करेगी। उनके लिए पर्याप्त प्रे-बेस, सुरक्षित कोर एरिया, मजबूत फील्ड स्टाफ और प्रभावी निगरानी व्यवस्था जरूरी होगी।
गुरुघासीदास-तमोर पिंगला पहले से ही बाघों के आवागमन वाले महत्वपूर्ण कॉरिडोर के रूप में काम करता है। ऐसे में नए बाघों को बसाने की योजना के साथ-साथ जंगल के भीतर संसाधन और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना भी उतना ही अहम माना जा रहा है।