सूरजपुर – कहते हैं कि, मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके हौसलों में उड़ान होती है। आंखों की रोशनी भले ही किसी इंसान से दुनिया के रंग छीन ले, लेकिन अगर इरादे मजबूत हों तो वही इंसान दूसरों की जिंदगी में रोशनी भर सकता है। शिक्षक दिवस के मौके पर आज हम आपको सूरजपुर के ऐसे ही शिक्षक से मिलवा रहे हैं, जिन्होंने जन्म से ही दोनों आंखों से नेत्रहीन होने के बावजूद अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। करीब 17 वर्षों से बच्चों को शिक्षा दे रहे शिक्षक दुर्गेश केसरी आज न सिर्फ अपने विद्यार्थियों, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा की मिसाल बन चुके हैं।
जन्म से नेत्रहीन, मगर हौसलों की उड़ान ने पहुंचाया मंजिल तक
सूरजपुर जिले के छोटे से गांव चंद्रपुर की शासकीय प्राथमिक शाला में शिक्षक दुर्गेश केसरी बच्चों को पढ़ाते हैं। जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा हासिल करने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना किया। करीब 30 वर्ष पहले दुर्गम इलाके से शुरू हुआ उनका पढ़ाई का सफर बिलासपुर से होते हुए जबलपुर तक पहुंचा। चुनौतियां लगातार सामने आती रहीं, लेकिन दुर्गेश ने कभी हार नहीं मानी। अपनी मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा पास की और शिक्षक बनकर बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली।
17 साल से बच्चों के भविष्य को दे रहे नई दिशा
दुर्गेश केसरी पिछले करीब 17 वर्षों से चंद्रपुर के इसी स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। उनके लिए शिक्षक होना सिर्फ किताबों का ज्ञान बच्चों तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की सही दिशा दिखाना है। उनके पढ़ाए हुए कई बच्चे आज कॉलेज की पढ़ाई कर रहे हैं, तो कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हुए हैं। अपने विद्यार्थियों को आगे बढ़ते देखना ही दुर्गेश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनका मानना है कि, किसी शिक्षक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार तब होता है, जब उसके पढ़ाए बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर अपने सपनों को पूरा करते हैं।
2011 में मिला शिक्षक पुरस्कार
दुर्गेश केसरी की लगन और समर्पण को देखते हुए उन्हें वर्ष 2011 में शिक्षक पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके लिए खुशी का पल था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी जिम्मेदारी का अंत नहीं, बल्कि बच्चों के लिए और बेहतर करने की शुरुआत माना। दुर्गेश के लिए स्कूल तक पहुंचना भी कई बार आसान नहीं होता। आने-जाने और रोजमर्रा की जरूरतों में परिवार के साथ-साथ स्कूल के सहकर्मियों का सहयोग उन्हें मिलता है। कई बार उनके पिता उन्हें स्कूल लेकर आते हैं, तो कभी स्कूल के साथी शिक्षक उनके आने-जाने में मदद करते हैं।
छह घंटे बच्चों के बीच, पढ़ाने का जुनून बरकरार
शारीरिक चुनौती के बावजूद दुर्गेश रोजाना करीब छह घंटे बच्चों के बीच रहते हैं। उनका पढ़ाने का तरीका बच्चों को बेहद पसंद आता है। वह विषयों को इस तरह समझाते हैं कि बच्चे उन्हें आसानी से समझ लेते हैं और पूरी पढ़ाई उन्हें किसी कहानी की तरह लगती है। स्कूल के प्रधानाध्यापक और अन्य शिक्षक भी दुर्गेश के पढ़ाने के तरीके और बच्चों के साथ उनके सहज व्यवहार की तारीफ करते हैं। उनका कहना है कि दुर्गेश की मौजूदगी स्कूल के पूरे स्टाफ के लिए प्रेरणादायक है। वह अपनी जिम्मेदारी पूरी लगन से निभाते हैं और उनकी शारीरिक चुनौती कभी उनके अध्यापन के आड़े नहीं आती।
बच्चों के बीच लोकप्रिय हैं दुर्गेश
दुर्गेश केसरी के पढ़ाने का अंदाज बच्चों को इतना पसंद है कि वे उनके साथ पढ़ने में बेहद उत्साहित नजर आते हैं। बच्चे भी उनके पढ़ाने के तरीके की खूब तारीफ करते हैं। कक्षा में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच का यह रिश्ता बताता है कि शिक्षा सिर्फ आंखों से देखकर नहीं, बल्कि समझ, अनुभव और समर्पण से भी दी जा सकती है।
संघर्ष से समाज के लिए बने मिसाल
दुर्गेश केसरी की कहानी सिर्फ एक नेत्रहीन शिक्षक की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस इच्छाशक्ति की कहानी है जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों के सामने भी झुकना नहीं जानती। जन्म से आंखों की रोशनी नहीं होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा हासिल की, प्रतियोगी परीक्षा पास की और आज 17 वर्षों से सैकड़ों बच्चों के भविष्य को दिशा दे रहे हैं। उनके संघर्ष में परिवार का सहयोग, सहकर्मियों का साथ और खुद के मजबूत इरादों की अहम भूमिका रही है।
हौसले और जज्बे की मिसाल बनी कहानी
शिक्षक दिवस पर दुर्गेश केसरी की कहानी यही संदेश देती है कि, हालात इंसान की राह जरूर मुश्किल कर सकते हैं, लेकिन मजबूत इरादों के सामने मंजिल कभी दूर नहीं रहती। खुद अंधेरे में रहकर बच्चों के जीवन में शिक्षा की रोशनी फैलाने वाले दुर्गेश केसरी आज सूरजपुर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक ऐसी मिसाल हैं, जिसे सलाम किया जाना चाहिए।