Raipur Ganesh Idol: गणेशोत्सव के पहले राजधानी रायपुर में भगवान गणेश की अनोखी और थीम आधारित प्रतिमाएं आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। इस बार मूर्तिकार पारंपरिक मिट्टी के साथ-साथ बांस, पूजा सामग्री, मोती, मसूर दाल, चना, भुट्टा और धूप-अगरबत्ती जैसी अलग-अलग चीजों का इस्तेमाल कर प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।
खास बात यह है कि कुछ प्रतिमाओं को तैयार करने में करीब तीन महीने तक का समय लगा है। ग्राहकों की पसंद और उनके कॉन्सेप्ट के मुताबिक डिजाइन तैयार कर उसमें मूर्तिकार अपनी रचनात्मकता जोड़ रहे हैं।
रायपुर के रायपुरा इलाके में रहने वाला यादव परिवार करीब 30 वर्षों से गणेश प्रतिमाएं बनाने का काम कर रहा है। परिवार के सदस्य बताते हैं कि खास थीम वाली प्रतिमाओं के लिए समितियां और ग्राहक काफी पहले ही ऑर्डर दे देते हैं।
बांस से तैयार की गई गणेश प्रतिमा
मूर्तिकार राहुल यादव के मुताबिक इस साल बांस से भगवान गणेश की एक खास प्रतिमा तैयार की गई है। इस प्रतिमा में सामान्य मिट्टी का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसे मुख्य रूप से बांस, लकड़ी और पेपर की मदद से तैयार किया गया है।
इस प्रतिमा का कॉन्सेप्ट ग्राहक की पसंद और मूर्तिकार की क्रिएटिविटी को मिलाकर तैयार किया गया है। बांस को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर उन्हें एक-एक करके जोड़ा गया है। बांस की ऊपरी परत हटाकर उसे आवश्यक आकार दिया गया और फिर पूरी संरचना को तैयार किया गया।
मूर्तिकार के अनुसार इस प्रतिमा को बनाने में करीब ₹40 से ₹50 हजार की लागत आई है। इस तरह की विशेष प्रतिमाएं सीमित संख्या में बनाई जाती हैं और ज्यादातर ऑर्डर पहले से बुक किए जाते हैं।
पूजा सामग्री से बनी गणेश प्रतिमा
इस परिवार ने पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से भी गणेश प्रतिमा तैयार की है। इसके मूल ढांचे को नारियल की जूट से तैयार किया गया है।
प्रतिमा की सजावट में कमल गट्टे की माला, रुद्राक्ष, मौली के धागे और मोतियों का इस्तेमाल किया गया है। मोतियों से तैयार की गई प्रतिमाओं को खासतौर पर गृह प्रवेश, धार्मिक आयोजन या उपहार के तौर पर देने के लिए भी तैयार किया जाता है।
धूप-अगरबत्ती से बनाई 12 फीट की प्रतिमा
इस साल की सबसे खास प्रतिमाओं में से एक 12 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा है, जिसे धूप-अगरबत्ती से जुड़े उत्पादों से तैयार किया गया है। इसे बनाने में लगभग तीन महीने का समय लगा।
प्रतिमा में अलग-अलग रंगों की धूप स्टिक का इस्तेमाल किया गया है। वहीं गीली धूप की मदद से माला, पुष्प और कड़े जैसी सजावट तैयार की गई है।
मूर्तिकार के मुताबिक एक समिति ने प्रतिमा का स्ट्रक्चर और थीम बताई थी, जिसके आधार पर इसे तैयार किया गया। मिट्टी की प्रतिमाओं की तुलना में ऐसी प्रतिमाएं अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, इसलिए काम के दौरान इन्हें आसानी से अलग-अलग स्थानों पर ले जाया जा सकता है।
मसूर दाल, चना और भुट्टे से गणेश जी
राहुल यादव ने खाद्य सामग्री का इस्तेमाल करते हुए भी एक अनोखी गणेश प्रतिमा तैयार की है। इसमें मसूर दाल, चना और भुट्टे को कलात्मक तरीके से सजाकर गणेश प्रतिमा का स्वरूप दिया गया है।
आमतौर पर गणेश प्रतिमाओं में मिट्टी या अन्य पारंपरिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन खाने की चीजों से तैयार यह प्रतिमा अपने अलग कॉन्सेप्ट के कारण लोगों का ध्यान खींच रही है।
30 साल से मूर्ति निर्माण कर रहा यादव परिवार
रायपुरा निवासी शिवचरण यादव का परिवार पिछले करीब तीन दशक से गणेश प्रतिमाएं तैयार कर रहा है। उनके दोनों बेटे भी लगभग 15 वर्षों से अपने पिता के साथ इस काम में हाथ बंटा रहे हैं।
परिवार के मुताबिक उनके पास सीमित संख्या में ही विशेष थीम वाली प्रतिमाओं के ऑर्डर आते हैं। कई समितियां गणेशोत्सव से करीब तीन महीने पहले ही अपनी पसंद और डिजाइन बताकर बुकिंग करा देती हैं।
रामसागर पारा की एक समिति पिछले करीब 17 वर्षों से इस परिवार से गणेश प्रतिमा बनवा रही है। परंपरा के साथ नए प्रयोगों को जोड़कर तैयार की जा रही ये प्रतिमाएं इस बार गणेशोत्सव में खास आकर्षण का केंद्र बनने वाली हैं।