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पैकेट वाले खाने पर अब सामने दिखेगा बड़ा हेल्थ अलर्ट? सुप्रीम कोर्ट में FSSAI ने रखा नया प्रस्ताव

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नई दिल्ली। पैकेज्ड फूड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान FSSAI ने फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग से जुड़ा अहम प्रस्ताव रखा है। प्रस्ताव के तहत ऐसे खाद्य और पेय पदार्थों के पैकेट पर सामने की तरफ चेतावनी देने की व्यवस्था की जा सकती है, जिनमें तय सीमा से अधिक नमक, चीनी या सैचुरेटेड फैट हो।

साथ ही, आर्टिफिशियल यानी नॉन-कैलोरिक स्वीटनर वाले उत्पादों के पैकेट के सामने “CONTAIN NON-CALORIC SWEETENER” लिखने का प्रस्ताव भी सामने आया है। अभी ऐसी जानकारी मुख्य रूप से पैकेट के पीछे दी जाती है।

हालांकि, इन नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश अभी सुरक्षित है, इसलिए इन्हें लागू नियम मानना जल्दबाजी होगी।

दो फेज की जगह एक फेज में लागू करने का प्रस्ताव

FSSAI ने पहले फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल को दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव दिया था।

पहले चरण में ऐसे उत्पादों को शामिल करने की बात थी, जिनमें फैट, शुगर या नमक में से दो या उससे अधिक पोषक तत्व तय सीमा से ज्यादा हों।

दूसरे चरण में उन उत्पादों को भी शामिल किया जाना था, जिनमें इनमें से कोई एक पोषक तत्व निर्धारित सीमा से अधिक हो।

अब FSSAI ने दोनों चरणों की जगह व्यवस्था को एक ही चरण में लागू करने का प्रस्ताव अदालत के सामने रखा है।

4 महीने नोटिफिकेशन, 60 दिन सुझाव और 365 दिन कंपनियों को

28 सितंबर की सुनवाई के दौरान FSSAI की ओर से नियम लागू करने की प्रक्रिया को लेकर टाइमलाइन भी बताई गई। प्रस्ताव के मुताबिक नोटिफिकेशन जारी करने के लिए 4 महीने, सुझाव और आपत्तियों के लिए 60 दिन तथा कंपनियों को नए नियम अपनाने के लिए 365 दिन दिए जाने की बात कही गई।

कोर्ट ने इस लंबी प्रक्रिया पर सवाल उठाए और पूछा कि जब 2022 में प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी तो इतने वर्षों बाद फिर से आपत्तियां और सुझाव मांगने की जरूरत क्यों पड़ रही है।

मामला पहुंचा कैसे सुप्रीम कोर्ट?

फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबलिंग का मामला 3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी नाम के पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट की जनहित याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

याचिका में पैकेज्ड और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट हेल्थ वार्निंग देने की मांग की गई थी। इसके बाद अदालत में FSSAI की ओर से नियमों और उनकी टाइमलाइन को लेकर लगातार सुनवाई हुई।

फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग क्या है?

Front of Pack Labelling यानी FOPL पैकेट के सामने दी जाने वाली ऐसी जानकारी है, जिसे ग्राहक बिना पूरा न्यूट्रिशन चार्ट पढ़े जल्दी समझ सके।

इसमें मुख्य रूप से शुगर, नमक, फैट जैसे पोषक तत्वों की मात्रा या उनसे जुड़े संभावित जोखिम को सरल तरीके से दिखाने का उद्देश्य होता है।

वर्तमान में न्यूट्रिशन संबंधी विस्तृत जानकारी आमतौर पर पैकेट के पीछे या साइड में दी जाती है।

किन उत्पादों को मिल सकती है छूट?

प्रस्ताव के अनुसार कुछ सिंगल-इंग्रीडिएंट उत्पादों और प्राकृतिक रूप से फैट, शुगर या नमक की अधिक मात्रा वाले कुछ उत्पादों को फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी से बाहर रखने की बात कही गई है।

इसमें शुद्ध घी, खाद्य तेल, सामान्य नमक, चीनी, गुड़ और शहद जैसे उत्पादों को उदाहरण के तौर पर शामिल किया गया है।

आर्टिफिशियल स्वीटनर पर भी नजर

प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नॉन-कैलोरिक स्वीटनर यानी बिना कैलोरी वाली मिठास वाले उत्पादों की लेबलिंग से जुड़ा है। ऐसे उत्पादों के पैकेट के सामने “CONTAIN NON-CALORIC SWEETENER” जैसी चेतावनी देने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

यह व्यवस्था उपभोक्ताओं को यह समझने में मदद कर सकती है कि किसी उत्पाद में अतिरिक्त नॉन-कैलोरिक स्वीटनर मौजूद है।

सैचुरेटेड और अनसैचुरेटेड फैट में अंतर

सैचुरेटेड फैट घी, मक्खन, मलाई, पनीर, चीज और कुछ मांसाहारी खाद्य पदार्थों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसका अत्यधिक सेवन LDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने से जुड़ा है।

वहीं अनसैचुरेटेड फैट मूंगफली, बादाम, अखरोट, तिल, कुछ वनस्पति तेल और मछली जैसे खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। संतुलित मात्रा में इन्हें आहार का हिस्सा माना जाता है।

अभी उपभोक्ताओं को क्या समझना चाहिए?

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का उद्देश्य खरीदारी के समय उपभोक्ताओं को सरल और तुरंत दिखाई देने वाली पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना है। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट में प्रस्ताव और सुनवाई को अंतिम लागू नियम नहीं माना जा सकता।

साथ ही, किसी एक खाद्य पदार्थ या आर्टिफिशियल स्वीटनर को सीधे डायबिटीज या हार्ट अटैक का कारण बताना वैज्ञानिक रूप से बहुत व्यापक निष्कर्ष होगा; स्वास्थ्य जोखिम मात्रा, कुल आहार, व्यक्तिगत स्वास्थ्य और अन्य कारकों पर निर्भर करते हैं।

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