हेल्थ डेस्क। सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘Bed Rotting’ शब्द युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसका मतलब है लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना, फोन चलाना, फिल्में या वेब सीरीज देखना, स्नैक्स खाना और बिना किसी खास काम के समय बिताना। इसे अक्सर भागदौड़ भरी जिंदगी और हर समय कुछ न कुछ करते रहने के दबाव से ब्रेक लेने के तरीके के रूप में देखा जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या घंटों बिस्तर पर पड़े रहने से वास्तव में मानसिक सुकून मिलता है, या धीरे-धीरे यह आदत नींद, दिनचर्या और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है?
कभी-कभार आराम करना गलत नहीं
काम, पढ़ाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच थकान महसूस होना स्वाभाविक है। ऐसे में छुट्टी के दिन कुछ घंटे आराम करना, पसंदीदा फिल्म देखना या फोन चलाना अपने आप में कोई गलत आदत नहीं है। हर समय व्यस्त रहना और खुद को लगातार उत्पादक बने रहने के लिए मजबूर करना भी जरूरी नहीं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, कभी-कभार बिस्तर पर आराम करना तनाव से राहत पाने का तरीका हो सकता है। लेकिन जब यह आदत बार-बार दोहराई जाने लगे, जरूरी काम प्रभावित होने लगें या व्यक्ति तनाव और परेशानियों से बचने के लिए लगातार बिस्तर पर रहने लगे, तो इस पर ध्यान देना जरूरी है।
कब परेशानी बन सकती है बेड रॉटिंग की आदत?
मान लीजिए, कोई व्यक्ति सुबह उठने के बाद घंटों बिस्तर पर फोन चलाता रहता है। धीरे-धीरे उसके सोने-जागने का समय बिगड़ने लगता है, जरूरी काम टलते जाते हैं और दोस्तों या परिवार के साथ समय बिताने की इच्छा भी कम होने लगती है।
अगर ऐसा लगातार हो रहा है, तो इसे केवल आराम की जरूरत मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
2018 में Sleep Health जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में 855 वयस्कों के बीच बिस्तर पर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की आदत का अध्ययन किया गया था। इसमें बिस्तर पर अधिक समय सोशल मीडिया इस्तेमाल करने और अनिद्रा, चिंता तथा सप्ताह के दिनों में कम नींद के बीच संबंध पाया गया। हालांकि, इस अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल ही इन समस्याओं का एकमात्र कारण है।
क्या बेड रॉटिंग का डिप्रेशन से भी संबंध है?
लंबे समय तक बिस्तर से उठने का मन न करना, लगातार थकान महसूस करना, पसंदीदा गतिविधियों में रुचि कम होना या रोजमर्रा के काम मुश्किल लगना कभी-कभी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी के संकेत हो सकते हैं।
हालांकि, केवल बिस्तर पर ज्यादा समय बिताने के आधार पर किसी व्यक्ति को डिप्रेशन होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके पीछे शारीरिक थकान, नींद की कमी, तनाव या अन्य कारण भी हो सकते हैं।
2024 में Journal of Affective Disorders में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 182 अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें सोशल मीडिया के समस्याग्रस्त इस्तेमाल और डिप्रेशन, चिंता तथा नींद की समस्याओं के बीच संबंध सामने आया। हालांकि, अलग-अलग अध्ययनों के परिणामों में अंतर था और शोधकर्ताओं ने इस संबंध को बेहतर ढंग से समझने के लिए आगे और शोध की जरूरत बताई।
यह शोध सीधे बेड रॉटिंग पर केंद्रित नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य के व्यापक संबंधों पर आधारित था।
बेड रॉटिंग की आदत से बाहर निकलने के 5 तरीके
अगर बिस्तर पर पड़े रहने की आदत आपकी दिनचर्या को प्रभावित करने लगी है, तो कुछ छोटे बदलाव मददगार हो सकते हैं।
- सोने-जागने का समय तय करें: हर दिन लगभग एक ही समय पर सोने और उठने की कोशिश करें।
- सुबह बिस्तर से बाहर निकलें: उठने के बाद कुछ देर टहलें या हल्की शारीरिक गतिविधि करें।
- फोन के इस्तेमाल की सीमा तय करें: खासकर सोने से पहले लंबे समय तक स्क्रीन देखने से बचें।
- लोगों से जुड़े रहें: दोस्तों और परिवार के साथ बातचीत और समय बिताने के लिए दिनचर्या में जगह बनाएं।
- आराम और जिम्मेदारियों में संतुलन रखें: खुद को आराम देने के साथ जरूरी कामों को लगातार टालने से बचें।
यदि लंबे समय तक उदासी, थकान, किसी काम में रुचि न रहना या बिस्तर से उठने में परेशानी बनी रहती है और इससे रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
सुकून देने वाला आराम या दिनचर्या से दूरी?
बेड रॉटिंग को न तो हर स्थिति में खराब आदत कहा जा सकता है और न ही इसे हमेशा सेल्फ-केयर का सही तरीका माना जा सकता है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आराम करने के बाद आप खुद को तरोताजा महसूस करते हैं या बिस्तर पर रहने की आदत आपकी नींद, कामकाज और रिश्तों को प्रभावित करने लगती है।
याद रखें: आराम करना जरूरी है, लेकिन अगर आराम के नाम पर रोजमर्रा की जिंदगी लगातार प्रभावित हो रही है, तो अपनी दिनचर्या और मानसिक स्थिति पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है।