केस स्टडी: अहमदाबाद की एक मां का कहना है कि उनका 15 साल का बेटा पढ़ाई में तेज है, टीचर्स उसकी तारीफ करते हैं, लेकिन जब भी क्लास में बोलना होता है या रिश्तेदारों से बात करनी होती है, वह घबरा जाता है। सवाल का जवाब जानते हुए भी चुप रहता है। मां को चिंता है कि यह झिझक उसके भविष्य में रुकावट न बन जाए।
एक्सपर्ट की राय (डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट)
अच्छा पढ़ने वाले बच्चे अक्सर परफॉर्मेंस प्रेशर और गलती करने के डर में रहते हैं। उन्हें लगता है कि सब उनसे परफेक्ट जवाब की उम्मीद रखते हैं। यही डर उनके आत्मविश्वास को रोकता है। अच्छी खबर यह है कि बोलना कोई जन्मजात गुण नहीं, बल्कि सीखी जाने वाली स्किल है। सही माहौल और मार्गदर्शन से बच्चा आसानी से खुल सकता है।
बोलने की झिझक दूर करने के स्मार्ट स्टेप्स
1️⃣ ‘समस्या’ नहीं, स्किल गैप समझें
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शर्मीला होना कोई कमजोरी नहीं।
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इसे एक सीखने की प्रक्रिया मानें, जैसे साइकिल चलाना।
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इससे बच्चा खुद पर कम प्रेशर महसूस करेगा।
2️⃣ ‘कुछ भी बोलो’ वाला माहौल बनाएं
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खाने की टेबल पर हल्के-फुल्के टॉपिक पर बातचीत करें।
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बच्चा कुछ भी कहे, बीच में टोके बिना ध्यान से सुनें।
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ऐसा माहौल बनाएं जहां बच्चा बिना जज हुए बोल सके।
3️⃣ छोटे मंच से शुरुआत करें
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सीधे डिबेट या स्टेज एक्ट में धकेलने के बजाय:
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उसे बुक क्लब, छोटे ग्रुप डिस्कशन जैसे लो-प्रेशर सेटअप में बोलने के मौके दें।
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धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा।
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4️⃣ पेरेंट्स न करें ये गलतियां
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बच्चे को हर बात पर टोकना या मजाक उड़ाना।
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दूसरों से उसकी तुलना करना।
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ज्यादा प्रेशर डालकर बोलने को मजबूर करना।
5️⃣ जरूरत हो तो प्रोफेशनल मदद लें
अगर घबराहट के लक्षण बहुत गहरे हैं (पसीना आना, पेट दर्द, कांपना, रोना), तो यह सोशल एंग्जाइटी का संकेत हो सकता है। इस स्थिति में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से मदद लेना बेहतर रहेगा।
निष्कर्ष:
आपका बच्चा बुद्धिमान है और संवेदनशील भी। उसका डर आत्मविश्वास की कमी से नहीं, बल्कि दूसरों की अपेक्षाओं को लेकर बनी झिझक से है। उसे हर वक्त भरोसा दिलाएं कि उसकी राय मायने रखती है, चाहे वह कितनी भी धीमी आवाज़ में क्यों न हो। धीरे-धीरे वह खुद को एक्सप्रेस करना सीख जाएगा।