आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा—मुख्य सचिव सो रहे हैं, आदेश का सम्मान नहीं; अब सभी को पेश होना पड़ेगा कोर्ट में

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देशभर में बढ़ती आवारा कुत्तों की समस्या पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है।
शुक्रवार को हुई सुनवाई में अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को 3 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने साफ कहा कि अब कोई राज्य इससे बच नहीं सकता। कोर्ट ने उन सभी राज्यों की छूट याचिकाएं खारिज कर दीं, जिनमें मुख्य सचिवों ने कोर्ट में पेश न होने की अपील की थी।


⚖️ “हमारे आदेश का सम्मान नहीं, तो आने दीजिए — हम निपट लेंगे”: जस्टिस नाथ

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा —

“जब हम मुख्य सचिवों से हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने को कहते हैं, तो वे चुप्पी साध लेते हैं। हमारे आदेशों की कोई परवाह नहीं की जाती। ठीक है, अब उन्हें आने दीजिए, हम उनसे खुद निपट लेंगे।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि पिछले कई आदेशों के बावजूद राज्यों ने सड़क पर घूम रहे आवारा कुत्तों और रेबीज के मामलों को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।


अब 3 नवंबर को तय होगी जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट ने 3 नवंबर को अगली सुनवाई तय की है।
इस दौरान सभी मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित रहना होगा।
पहले कोर्ट ने 27 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल और तेलंगाना को छोड़कर बाकी सभी राज्यों से जवाब मांगा था,
लेकिन चूंकि कई राज्यों ने जवाब नहीं दिया, इसलिए अदालत ने यह सख्त कदम उठाया है।


रेबीज मामलों पर मीडिया रिपोर्ट के बाद शुरू हुई थी सुनवाई

दरअसल, मामला तब उठा जब जुलाई में एक मीडिया रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि देश के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों के काटने से रेबीज संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई से स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए पूरे मामले की सुनवाई शुरू की थी।


22 अगस्त को कोर्ट ने केस का दायरा बढ़ाया था

22 अगस्त की सुनवाई में कोर्ट ने इस केस को केवल दिल्ली-NCR तक सीमित न रखते हुए पूरे देश में लागू कर दिया था।
कोर्ट ने कहा था —

“जिन कुत्तों को पकड़ा जाता है, उन्हें नसबंदी (Sterilization) और टीकाकरण (Vaccination) के बाद उसी जगह छोड़ा जाए,
जहां से उन्हें पकड़ा गया था।”

हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि
रेबीज से संक्रमित या अत्यधिक आक्रामक कुत्तों को शेल्टर होम (Animal Shelter) में ही रखा जाए ताकि सार्वजनिक सुरक्षा बनी रहे।


⚠️ पहले आए आदेश पर भी जताई थी नाराज़गी

सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त के एक पुराने आदेश को भी “बहुत सख्त” बताते हुए उस पर असहमति जताई थी।
उस आदेश में कहा गया था कि दिल्ली-NCR के सभी आवारा कुत्तों को 8 हफ्तों के भीतर रहवासी इलाकों से हटाकर हमेशा के लिए शेल्टर होम्स में भेज दिया जाए।

जस्टिस नाथ की बेंच ने कहा था —

“ऐसा कठोर कदम संतुलित समाधान नहीं है। हमें ऐसे उपाय चाहिए जो इंसानों और जानवरों दोनों के हित में हों।”


क्यों चिंता का विषय है आवारा कुत्तों का मुद्दा

देश के कई राज्यों में रेबीज और डॉग बाइट्स की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल 15–20 लाख लोग आवारा कुत्तों के काटने के शिकार होते हैं।
ग्रामीण इलाकों में यह समस्या और भी गंभीर है, जहां टीकाकरण और नियंत्रण व्यवस्था कमजोर है।


क्या है राज्यों की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह कहा है कि

  • सभी राज्य सरकारें स्थानीय निकायों के साथ मिलकर नसबंदी और वैक्सीनेशन अभियान चलाएं।

  • हर जिले में एनिमल कंट्रोल ऑफिसर नियुक्त किया जाए।

  • और रेबीज की रोकथाम पर जनजागरूकता अभियान चलाया जाए।

लेकिन कोर्ट के अनुसार, अधिकांश राज्यों ने अब तक इस पर कोई ठोस जवाब या रिपोर्ट दाखिल नहीं की है।


⚖️ अब क्या होगा आगे?

अब 3 नवंबर की सुनवाई बेहद अहम मानी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि जो राज्य कोर्ट के आदेशों को हल्के में लेंगे, उन्हें जवाब देना होगा।

अदालत ने कहा —

“यह सिर्फ आवारा कुत्तों का नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा और जनस्वास्थ्य का मामला है। अगर सरकारें सोती रहेंगी, तो कोर्ट खुद कार्रवाई करेगा।”


निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश — “अब जवाबदेही तय होगी”

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख संकेत देता है कि अब यह मामला सिर्फ रिपोर्ट या सलाह तक सीमित नहीं रहेगा।
आवारा कुत्तों की समस्या पर राज्यों की लापरवाही और प्रशासनिक सुस्ती को लेकर कोर्ट सीधे जवाब मांगने के मूड में है।

3 नवंबर की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या राज्य सच में जागते हैं —
या फिर जैसा जस्टिस नाथ ने कहा,

“मुख्य सचिव अब तक सो रहे हैं, तो आने दीजिए… हम खुद निपट लेंगे।”

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