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छत्तीसगढ़ में धान खरीदी बना उत्सव, लेकिन उठाव बना चुनौती: सवा महीने में 47 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा खरीदी

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रायपुर। छत्तीसगढ़ में इस साल 15 नवंबर से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर शुरू हुई धान खरीदी ने रिकॉर्ड रफ्तार पकड़ ली है। सवा महीने के भीतर राज्यभर में 47 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान की खरीदी हो चुकी है, लेकिन इसके मुकाबले धान का उठाव बेहद धीमा है। अब तक उपार्जन केंद्रों से केवल करीब पौने दस लाख मीट्रिक टन धान ही बाहर जा पाया है, जबकि शेष धान सोसाइटियों और खरीदी केंद्रों में जमा है। इसी वजह से धान में सूखत का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है और सोसाइटी संचालकों की चिंता भी गहराती जा रही है।

राज्य के अलग-अलग जिलों से आ रही जानकारी के मुताबिक, खरीदी केंद्रों में धान का अंबार लग चुका है। जिस तेजी से किसानों से धान खरीदा जा रहा है, उसके मुकाबले परिवहन और उठाव की गति काफी पीछे चल रही है। फिलहाल केवल मिलरों को ही धान का उठाव दिया जा रहा है, जबकि मार्कफेड के संग्रहण केंद्रों के लिए अब तक बड़े स्तर पर धान का परिवहन शुरू नहीं हो सका है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि कई उपार्जन केंद्र अपनी तय बफर लिमिट से कहीं ज्यादा धान जमा करने को मजबूर हैं।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 15 नवंबर से अब तक राज्य में कुल 47 लाख 51 हजार 275 मीट्रिक टन धान की खरीदी हो चुकी है। इसके मुकाबले मिलरों द्वारा उठाया गया धान मात्र 9 लाख 86 हजार 646 मीट्रिक टन है। यानी भारी मात्रा में धान अभी भी खरीदी केंद्रों में ही पड़ा हुआ है। सोसाइटी संचालकों का कहना है कि अगर मार्कफेड के संग्रहण केंद्रों के लिए भी तेजी से परिवहन शुरू हो जाए, तो स्थिति को संभाला जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है।

धान के इस भारी जखीरे के बीच सबसे बड़ा संकट सूखत को लेकर है। पिछले सीजन में ही राज्य की सैकड़ों सोसाइटियों में धान सूखने के कारण वजन कम हुआ था। उस कमी की भरपाई सोसाइटी प्रबंधकों से कराई गई और कई मामलों में लाखों रुपये की वसूली हुई। जिन प्रबंधकों ने राशि जमा नहीं की, उनके खिलाफ एफआईआर तक दर्ज की गई। यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा, जहां अब भी अंतिम फैसला लंबित है। पिछले साल का यह अनुभव अभी ताजा है और इस बार फिर धान की भारी मात्रा जमा होने से वही संकट दोबारा सिर उठाता दिख रहा है।

स्थिति को देखते हुए खाद्य विभाग ने धान का उठाव तेज करने के बजाय कई जगहों पर उपार्जन केंद्रों की बफर लिमिट ही बढ़ा दी है। सोसाइटी संचालकों का कहना है कि तय सीमा से दोगुना तक धान जमा हो चुका है, जबकि भंडारण की जगह और सुरक्षा व्यवस्था पहले जैसी ही है। इससे जोखिम और बढ़ गया है।

दरअसल, जब किसानों से धान खरीदा जाता है, तब उसमें नमी होती है। नियमों के अनुसार 17 प्रतिशत तक नमी स्वीकार्य है। यही नम धान जब बोरियों में भरकर लंबे समय तक धूप और गर्मी में पड़ा रहता है, तो सूखने लगता है। इस प्रक्रिया को सूखत कहा जाता है, जिसमें धान का वजन कम हो जाता है। वजन में आई इसी कमी की भरपाई की जिम्मेदारी सोसाइटी और खरीदी प्रभारी पर डाल दी जाती है।

ऐसे में एक ओर जहां छत्तीसगढ़ में धान खरीदी किसानों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं है, वहीं दूसरी ओर उठाव और परिवहन की धीमी रफ्तार सोसाइटी संचालकों के लिए बड़ी परेशानी बनती जा रही है। समय रहते धान का सुचारु उठाव नहीं हुआ, तो यह समस्या आने वाले दिनों में और गंभीर रूप ले सकती है।

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