छत्तीसगढ़ में पटवारी से राजस्व निरीक्षक पदोन्नति को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद आखिरकार हाईकोर्ट के फैसले के साथ थम गया है। पदोन्नति के बाद प्रशिक्षण की मांग कर रहे चयनित अभ्यर्थियों को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उनकी सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जब पूरी चयन प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में हो, तब किसी भी तरह का लाभ देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
यह फैसला जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने सुनाया। अदालत के अनुसार, जिस प्रक्रिया पर ही गंभीर सवाल खड़े हो चुके हों, उस आधार पर चयनित अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण या आगे का कोई अधिकार देना व्यवस्था और कानून दोनों के खिलाफ होगा। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने सभी याचिकाओं को निरस्त कर दिया।
पूरा विवाद वर्ष 2023 में आयोजित विभागीय परीक्षा से जुड़ा है, जिसे राजस्व विभाग ने पटवारियों को राजस्व निरीक्षक पद पर पदोन्नति देने के लिए कराया था। इस परीक्षा में राज्यभर से करीब 2600 पटवारियों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से 216 को सफल घोषित किया गया। लेकिन परिणाम जारी होते ही परीक्षा की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे। कई पटवारियों ने पेपर लीक, चयन में पक्षपात, रिश्तेदारों को अनुचित लाभ देने और नियमों के उल्लंघन जैसे गंभीर आरोप लगाए।
इन आरोपों को हल्के में नहीं लिया गया। राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया। समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद परीक्षा प्रक्रिया में कई खामियां उजागर हुईं, जिससे चयन पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गया। इसी बीच चयनित पटवारियों ने खुद को निर्दोष बताते हुए हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि बिना किसी गलती के उन्हें परेशान किया जा रहा है। उनका कहना था कि चयन सूची जारी हो चुकी है और नियमों के मुताबिक प्रशिक्षण अक्टूबर में शुरू होना चाहिए था, लेकिन देरी के कारण उन्हें वरिष्ठता और वेतन दोनों का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत का मानना था कि जब चयन प्रक्रिया पर ही भरोसा नहीं किया जा सकता, तो चयन के आधार पर किसी प्रकार का अधिकार नहीं दिया जा सकता। इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि जब तक पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहाल नहीं होती, तब तक पदोन्नति और उससे जुड़े लाभों का दावा टिक नहीं सकता।