आवारा कुत्तों की देखभाल को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। दिल्ली में इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी और बीजेपी आमने-सामने हैं और बयानबाज़ी लगातार तीखी होती जा रही है। इसी बीच पशु अधिकारों की मुखर आवाज़ मानी जाने वाली मेनका गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश पर सवाल उठाकर बहस को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने स्कूलों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने से जुड़े आदेश को न केवल गलत बताया, बल्कि यह भी कहा कि इस फैसले ने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है।
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में मीडिया से बातचीत के दौरान मेनका गांधी ने कहा कि जजों का यह फैसला संतुलित नहीं है। उनके मुताबिक, इस आदेश ने देश को पशुओं से प्रेम करने वालों और उनसे नफरत करने वालों के खेमे में बांटने का काम किया है। उन्होंने पशु कल्याण अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि यह एक मजबूत और मानवीय कानून है, जिसे हटाया नहीं गया, लेकिन आदेश के जरिए उसके उलट काम करने की छूट दे दी गई, जो सही नहीं है। उनका मानना है कि कानून के दायरे में रहकर ही समाधान निकाला जाना चाहिए, न कि भावनाओं को टकराव की दिशा में धकेलकर।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि दिल्ली की सियासत से जुड़ी है, जहां आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच पहले से ही तल्खी बनी हुई है। हाल ही में आम आदमी पार्टी ने एक सर्कुलर का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि दिल्ली के शिक्षकों को आवारा कुत्तों की देखभाल में लगाया जा रहा है, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इस दावे ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। बीजेपी की ओर से दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी और उन्होंने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया।
आशीष सूद ने साफ शब्दों में कहा कि अगर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल अपने आरोपों को साबित नहीं कर पाते, तो उन्हें माफी मांगनी चाहिए, अन्यथा उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। उन्होंने चुनौती दी कि अगर ऐसा कोई आदेश है, जिसमें शिक्षकों को आवारा कुत्तों की देखभाल की जिम्मेदारी दी गई हो, तो उसे सार्वजनिक किया जाए। बीजेपी का आरोप है कि आम आदमी पार्टी जानबूझकर झूठा प्रचार कर रही है।
इस पर आम आदमी पार्टी के दिल्ली अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने पलटवार करते हुए कहा कि बीजेपी सरकार की नीतियों की असलियत सामने आ चुकी है, इसलिए वह एफआईआर की धमकी दे रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी दबाव में झुकने वाली नहीं है और यह बताना सरकार की जिम्मेदारी है कि सर्कुलर किसने और किस आधार पर जारी किया।
कुल मिलाकर, आवारा कुत्तों की देखभाल का मुद्दा अब सिर्फ प्रशासनिक या मानवीय सवाल नहीं रह गया है, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मेनका गांधी की तीखी प्रतिक्रिया ने इस बहस को और गहरा कर दिया है, जहां एक तरफ पशु अधिकारों की चिंता है तो दूसरी ओर सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का सवाल। आने वाले दिनों में यह विवाद और तेज़ होने के संकेत दे रहा है।