अमेरिका की सेमीकंडक्टर रणनीति को लेकर बहस उस वक्त और तेज हो गई, जब राष्ट्रपति Donald Trump ने चिप निर्माता Intel की नई उपलब्धि को खुले मंच से “अमेरिकी इंडस्ट्री की ऐतिहासिक जीत” बताया। इंटेल ने दावा किया है कि उसने पहला ऐसा सब-2 नैनोमीटर प्रोसेसर तैयार किया है, जिसकी डिजाइनिंग, मैन्युफैक्चरिंग और पैकेजिंग—तीनों चरण पूरी तरह अमेरिका में ही किए गए हैं। ट्रंप ने इसे ‘मेड इन यूएस’ विजन की सफलता और अपनी आक्रामक मैन्युफैक्चरिंग नीति का प्रत्यक्ष नतीजा करार दिया।
सोशल मीडिया पर साझा बयान में ट्रंप ने इंटेल के सीईओ Lip-Bu Tan के साथ हुई बैठक को “शानदार” बताया और कहा कि सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक सेक्टर में अमेरिका की वापसी अब सिर्फ नारा नहीं, हकीकत बन चुकी है। ट्रंप के मुताबिक, इंटेल का सब-2 नैनोमीटर CPU न सिर्फ तकनीकी रूप से बेहद उन्नत है, बल्कि यह उस निर्भरता को भी तोड़ता है, जो बीते वर्षों में एशिया—खासकर China—पर बढ़ती चली गई थी।
ट्रंप ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा कि अमेरिकी सरकार इंटेल में हिस्सेदार है और इस निवेश से महज चार महीनों में 10 अरब डॉलर से ज्यादा की कमाई हो चुकी है। उनके शब्दों में, “यह सिर्फ कंपनी की जीत नहीं, बल्कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स की जीत है।” ट्रंप का कहना है कि घरेलू चिप मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए लगाए गए टैरिफ और कड़े व्यापार फैसलों ने ही इस बदलाव की जमीन तैयार की।
इंटेल के सीईओ लिप-बू तान ने भी अमेरिकी प्रशासन के समर्थन को अहम बताया और कहा कि कंपनी अब अपनी ‘कोर अल्ट्रा सीरीज 3’ के तहत सबसे एडवांस्ड प्रोसेसर की शिपिंग शुरू कर चुकी है। उनके मुताबिक, अमेरिका में बना यह चिप सिर्फ परफॉर्मेंस नहीं, बल्कि सप्लाई-चेन सिक्योरिटी और टेक्नोलॉजिकल आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है।
इस पूरे घटनाक्रम को ट्रंप अपनी टैरिफ नीति से जोड़कर देख रहे हैं। उन्होंने भारत और चीन जैसे बड़े निर्यातक देशों पर लगाए गए भारी आयात शुल्क का हवाला देते हुए कहा कि इन फैसलों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है और व्यापार घाटा ऐतिहासिक स्तर पर नीचे आया है। ट्रंप का दावा है कि टैरिफ ने न सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग लौटाई, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत किया।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या इंटेल की यह सब-2 नैनोमीटर छलांग वाकई सेमीकंडक्टर रेस में अमेरिका को निर्णायक बढ़त दिला देगी, या यह सिर्फ एक तकनीकी बढ़त भर है, जिसे एशियाई दिग्गज जल्द ही बराबर कर लेंगे। फिलहाल, इतना साफ है कि चिप्स की यह जंग अब सिर्फ तकनीक की नहीं, बल्कि भू-राजनीति और वैश्विक ताकत संतुलन की लड़ाई बन चुकी है।