बॉलीवुड में अगर किसी अभिनेता की कहानी सबसे ज़्यादा प्रेरित करती है, तो वह ऋतिक रोशन की है। चमक-दमक से भरी इस इंडस्ट्री में जहां परफेक्ट डिक्शन, बेमिसाल फिटनेस, डांस और एक्शन की मांग होती है, वहीं ऋतिक के जीवन की शुरुआत इन्हीं मोर्चों पर संघर्ष से हुई। बचपन की गंभीर हकलाहट, युवावस्था में रीढ़ की बीमारी और डॉक्टरों की सख़्त चेतावनियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज 52 की उम्र में वे सिर्फ़ सुपरस्टार नहीं, बल्कि इस बात की मिसाल हैं कि अगर इरादा मज़बूत हो तो कमज़ोरियां भी ताकत बन जाती हैं।
ऋतिक की पढ़ाई बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल से शुरू हुई और सिडेनहम कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक की डिग्री तक पहुंची। उनके पिता राकेश रोशन चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पर फोकस करे और विदेश जाकर आगे की शिक्षा ले। अमेरिका की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन ऋतिक का दिल बचपन से सिनेमा में धड़कता था। उन्होंने सुरक्षित रास्ता छोड़कर सपनों की राह चुनी—और यहीं से असली संघर्ष शुरू हुआ।
फिल्मी परिवार से होने के बावजूद ऋतिक को रेड-कार्पेट लॉन्च नहीं मिला। उन्होंने सेट की ज़मीन से सीखने का फैसला किया। पिता के साथ सहायक निर्देशक बने और फिल्मों के सेट पर झाड़ू लगाना, चाय परोसना, क्लैप देना—हर छोटा-बड़ा काम किया। ‘किंग अंकल’, ‘करण अर्जुन’ और ‘कोयला’ जैसी फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर रहते हुए उन्होंने फिल्ममेकिंग की बारीकियां समझीं। पैक-अप के बाद सीन दोहराकर खुद को परखते रहे—क्या मैं बेहतर हो रहा हूं?
इस बीच एक और जंग चल रही थी—हकलाहट की। बचपन से ही बोलने में दिक्कत इतनी थी कि दोस्ती और रिश्ते बनाना मुश्किल हो जाता। स्कूल में मज़ाक उड़ता, ओरल टेस्ट के दिन बहाने बनते। बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ऋतिक ने स्वीकार किया कि वे इतने शर्मीले थे कि घर आकर रोते थे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। स्पीच थेरेपी ली, ज़ोर-ज़ोर से किताबें पढ़ीं, अपनी तकनीक विकसित की—और आत्मविश्वास लौटने लगा।
एक्टिंग में कदम रखने से पहले ही किस्मत ने एक और परीक्षा ली। 21 साल की उम्र में स्कोलियोसिस—रीढ़ की हड्डी में घुमाव—का पता चला। डॉक्टरों ने साफ कहा: डांस मुश्किल है, एक्शन जोखिम भरा है, एक्टिंग प्रोफेशन चुना तो स्थायी डिसएबिलिटी का खतरा है। किसी के भी सपने यहां टूट जाते, लेकिन ऋतिक ने चुनौती स्वीकार की। उन्होंने बीमारी पर रिसर्च की, नियमित फिजियोथेरेपी की और शरीर को वैज्ञानिक ढंग से मज़बूत किया। तब वे दुबले-पतले थे, फिजीक बनाने से भी मना किया गया था—फिर भी उन्होंने ट्रेनिंग जारी रखी।
दर्द के साथ मेहनत उनकी पहचान बनी। प्लैंक्स, वेट्स, फ्लेक्सिबिलिटी ड्रिल्स—सब कुछ अनुशासन के साथ। डांस रिहर्सल तब तक, जब तक थकान हावी न हो जाए। दर्द था, लेकिन हौसला उससे बड़ा। नतीजा यह हुआ कि उनके डांस में फ्लूइडिटी आई, मूव्स में प्रिसीजन और एक्सप्रेशन में जान। एक्शन सीन्स में उनकी फिजीक और कंट्रोल ने हर फ्रेम को इम्पैक्टफुल बना दिया।
साल 2000 में ‘कहो ना… प्यार है’ से डेब्यू हुआ और इतिहास बन गया। रातोंरात सुपरस्टार—स्टाइल, डांस और एक्टिंग ने देश को दीवाना बना दिया। लेकिन चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। ‘कृष’ की शूटिंग के दौरान सिंगापुर में एक खतरनाक स्टंट में तार टूट गई; लगभग 50 फीट की गिरावट—किस्मत ने साथ दिया, जान बची। 2013 में ‘कृष 3’ के दौरान पीठ में गंभीर चोट, ‘अग्निपथ’ में हाथ में गहरा कट, स्लिप डिस्क, ब्रेन हेमरेज—कई सर्जरी और महीनों के बेड रेस्ट की सलाह। फिर भी उन्होंने परफेक्शन से समझौता नहीं किया। समय पर फिल्म पूरी करने की जिद—यही उनकी पहचान है।
दिलचस्प बात यह भी कि ऋतिक हर किरदार के लिए अलग परफ्यूम चुनते हैं। उनका मानना है कि खुशबू यादों और भावनाओं से गहराई से जुड़ी होती है, इसलिए नई खुशबू उन्हें किरदार में ढलने में मदद करती है। निजी जीवन में भी उतार-चढ़ाव रहे—शादी, तलाक, जिम्मेदारियां—लेकिन वे संतुलन के साथ आगे बढ़ते रहे।
अब कहानी एक नए मोड़ पर है। ‘कृष 4’ के साथ ऋतिक निर्देशन में कदम रखने जा रहे हैं। पिता राकेश रोशन ने खुद ऐलान किया कि 25 साल पहले अभिनेता के रूप में लॉन्च करने के बाद, अब वे बेटे को निर्देशक के रूप में लॉन्च कर रहे हैं। यह सिर्फ़ करियर का नया अध्याय नहीं, बल्कि एक लंबे संघर्ष की स्वाभाविक परिणति है।
ऋतिक रोशन की यात्रा बताती है कि प्रतिभा के साथ अगर अनुशासन, धैर्य और जिद हो, तो डॉक्टरों की मनाही भी राह नहीं रोक सकती। हकलाहट से हौसले तक, बीमारी से बेमिसाल फिटनेस तक—उन्होंने हर बार साबित किया कि कमज़ोरी ही सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।