भारतीय रसोई में कुछ व्यंजन ऐसे होते हैं जो स्वाद से ज्यादा सुकून देते हैं, और कढ़ी उन्हीं में से एक है। खासकर राजस्थानी कढ़ी की बात ही अलग है। न ज्यादा मसालों का बोझ, न पकौड़ों की भारीपन भरी परत—बस बेसन, खट्टी छाछ और खुशबूदार तड़के का संतुलन, जो हर कौर में देसी अपनापन घोल देता है। चावल के साथ इसका मेल ऐसा है कि एक बार खाने के बाद बार-बार वही स्वाद दोहराने का मन करता है।
राजस्थानी कढ़ी की खूबी इसकी सादगी में छुपी है। इसे बनाने के लिए खट्टी छाछ और बेसन को अच्छी तरह फेंटकर चिकना घोल तैयार किया जाता है, जिसमें हल्दी, धनिया पाउडर और नमक मिलाकर हल्का, पतला मिश्रण बनाया जाता है। दूसरी ओर कढ़ाही में घी गरम होते ही जीरा, राई, सूखी लाल मिर्च और करी पत्तों का तड़का पड़ता है, जिसकी खुशबू से ही भूख जाग उठती है। हींग डालते ही तैयार घोल कढ़ाही में उतारा जाता है और लगातार चलाते हुए मध्यम आंच पर पकाया जाता है, ताकि कढ़ी फटे नहीं और उसका टेक्सचर रेशमी बना रहे।
धीरे-धीरे पकने पर कढ़ी हल्की गाढ़ी हो जाती है और उसमें घी व मसालों की खुशबू घुलकर पारंपरिक राजस्थानी स्वाद उभर आता है। अंत में आंच धीमी कर दी जाती है और चाहें तो ऊपर से थोड़ा सा घी डालकर इसे और भी खुशबूदार बनाया जा सकता है। गरमा-गरम सादे चावल के साथ परोसी गई यह कढ़ी हल्की होने के साथ-साथ बेहद संतोषजनक लगती है। साथ में कटा प्याज, हरी मिर्च और नींबू हो तो स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। लंच हो या डिनर, यह कढ़ी हर वक्त थाली में अपनी खास जगह बना लेती है।