विश्व पुस्तक मेला-2026 में ‘प्रत्याघात’ का भव्य लोकार्पण: चित्रा मुद्गल के हाथों हुआ ब्रह्मवीर सिंह के उपन्यास का विमोचन, मोबाइल छोड़ किताबों की ओर लौटने का संदेश

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हिंदी साहित्य के लिए विश्व पुस्तक मेला-2026 का मंच इस बार एक खास साक्षी बना, जब भारत मंडपम में आयोजित समारोह में उपन्यास ‘प्रत्याघात’ का भव्य विमोचन हुआ। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध लेखिका Chitra Mudgal ने वरिष्ठ पत्रकार और लेखक Brahmveer Singh के इस नए उपन्यास का लोकार्पण किया। ‘प्रत्याघात’ महज एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि नैतिकता, सत्य और न्याय के संघर्ष की वह गूंज है, जो लेखक के चर्चित उपन्यास ‘बुत मरते नहीं’ की कथा को आगे बढ़ाती है और उसके अधूरे सवालों का जवाब तलाशती है।

इस गरिमामय आयोजन में पद्मश्री से सम्मानित कवि Sunil Jogi, लेखक-कवि और दैनिक हिंदुस्तान के प्रबंध संपादक Pratap Somvanshi तथा वरिष्ठ पत्रकार Himanshu Dwivedi की उपस्थिति ने समारोह को और भी विशेष बना दिया। उपन्यास का प्रकाशन Prabhat Prakashan द्वारा किया गया है। वक्ताओं ने एक स्वर में माना कि ‘प्रत्याघात’ समकालीन समाज के भीतर दबे हुए सवालों और टूटे हुए मनुष्यों की आवाज़ है।

अपने संबोधन में ब्रह्मवीर सिंह ने कहा कि ‘बुत मरते नहीं’ का अंत कई पाठकों को असत्य की जीत जैसा लगा था। नायक की मृत्यु, आदर्शों का टूटना और अवसाद की छाया—इन सबने पाठकों को असहज किया। इसी बेचैनी ने ‘प्रत्याघात’ को जन्म दिया। लेखक के अनुसार यह उपन्यास उस अन्याय के खिलाफ एक न्यायपूर्ण प्रतिक्रिया है, जो पहले भाग में घटित हुआ था। यह उन लोगों की कहानी है जो टूट तो गए, लेकिन मिटे नहीं; जो हताशा और अवसाद के बीच भी सत्य के साथ खड़े रहने का साहस जुटाते हैं।

कार्यक्रम के दौरान ब्रह्मवीर सिंह ने पाठकों से एक भावुक अपील भी की। उन्होंने कहा कि आज जब मोबाइल की स्क्रीन ने मनुष्य को जकड़ लिया है, तब किताबें ही हैं जो संवेदना, विचार और जीवन का रस बचा सकती हैं। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे कुछ समय स्क्रीन से हटकर पुस्तकों के साथ बिताएं। उनका यह संदेश श्रोताओं के बीच गहरी छाप छोड़ गया।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि ‘प्रत्याघात’ लेखक के साहित्यिक विकास का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रायपुर से लेकर नई दिल्ली तक के उनके पत्रकारिता और लेखन के सफर ने इस कृति को एक अलग गहराई दी है। वहीं प्रताप सोमवंशी ने उपन्यास की पंक्तियों की तुलना मुक्तिबोध की चेतना से करते हुए कहा कि पत्रकारों के अनुभव साहित्य को असाधारण रूप से समृद्ध कर सकते हैं, बशर्ते वे लिखने का साहस करें।

कवि सुनील जोगी ने उपन्यास की शुरुआती पंक्तियों को अत्यंत मार्मिक बताते हुए कहा कि आज के नीरस होते समाज में जीवन और उसके रस को खोजने का काम ऐसी ही कृतियां कर सकती हैं। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पंक्तियों के जरिए यह संदेश दिया कि जो शब्द किताबों में दर्ज हो जाते हैं, वे कभी मिटते नहीं।

प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार ने विश्वास जताया कि जिस तरह ‘बुत मरते नहीं’ ने पाठकों के बीच अपनी जगह बनाई, उसी तरह ‘प्रत्याघात’ भी सफलता की कहानी दोहराएगा। कुल मिलाकर, विश्व पुस्तक मेला-2026 में ‘प्रत्याघात’ का यह लोकार्पण न सिर्फ एक पुस्तक का विमोचन था, बल्कि हिंदी साहित्य में विचार, संवेदना और न्याय की एक सशक्त वापसी का संकेत भी था।

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