ट्रम्प का गोल्डन डोम कार्ड: ग्रीनलैंड चाहिए, हल निकालेंगे; ग्रीनलैंड ने दो टूक कहा—अमेरिका का गुलाम नहीं बनेंगे

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अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर विवाद को हवा दे दी है। व्हाइट हाउस में अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारियों के बीच हुई हाई-लेवल बैठक के बाद ट्रम्प ने साफ कहा कि अमेरिका के महत्वाकांक्षी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट के लिए ग्रीनलैंड बेहद अहम है और “कुछ न कुछ हल निकाल ही लिया जाएगा।” ट्रम्प का दावा है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में नहीं लिया, तो रूस या चीन वहां पैर जमा सकते हैं—और वे ऐसा कभी नहीं होने देंगे।

ट्रम्प जिस गोल्डन डोम की बात कर रहे हैं, वह इजराइल के आयरन डोम से प्रेरित अमेरिका का मेगा मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, जिसका मकसद चीन और रूस जैसे देशों से आने वाले संभावित मिसाइल खतरों को अंतरिक्ष में ही नाकाम करना है। करीब 175 अरब डॉलर के इस प्रोजेक्ट में 1200 से ज्यादा सैटेलाइट्स तैनात करने की योजना है, जिनमें सर्विलांस और इंटरसेप्टर—दोनों तरह के सैटेलाइट शामिल होंगे। ट्रम्प का दावा है कि यह सिस्टम 2029 तक पूरी तरह ऑपरेशनल हो सकता है।

हालांकि ट्रम्प की इस आक्रामक रणनीति को ग्रीनलैंड ने सिरे से खारिज कर दिया है। ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री Vivian Motzfeldt ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका के साथ सहयोग मजबूत करना अलग बात है, लेकिन अमेरिका का राज स्वीकार करना नामुमकिन है। उनका कहना था कि “हम सहयोग चाहते हैं, गुलामी नहीं।” यही नहीं, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री तय समय से पहले ही व्हाइट हाउस की बैठक छोड़कर बाहर निकल गए, जिससे असहमति खुलकर सामने आ गई।

डेनमार्क के विदेश मंत्री Lars Løkke Rasmussen ने ट्रम्प के इस दावे को भी खारिज किया कि ग्रीनलैंड को चीन और रूस से तत्काल खतरा है। उन्होंने कहा कि खुफिया जानकारियों के मुताबिक पिछले एक दशक में ग्रीनलैंड के आसपास कोई चीनी युद्धपोत नहीं आया है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति बदल रही है और सहयोगियों के साथ सैन्य तालमेल बढ़ाया जा रहा है।

इस बीच अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने मतभेदों के बावजूद ग्रीनलैंड से जुड़े मुद्दों पर बातचीत के लिए एक संयुक्त वर्किंग ग्रुप बनाने पर सहमति जताई है, जिसकी बैठकें आने वाले हफ्तों में होंगी। अमेरिका की ओर से इस चर्चा में विदेश मंत्री Marco Rubio और उपराष्ट्रपति JD Vance शामिल रहे।

आर्कटिक में हलचल यहीं नहीं रुकी। स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी और नॉर्वे जैसे देशों ने भी ग्रीनलैंड में सैन्य सहयोग बढ़ाने की घोषणा कर दी है। ग्रीनलैंड की अपनी कोई सेना नहीं है और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है, जबकि अमेरिका वहां पहले से ही Pituffik Space Base (पूर्व थुले एयर बेस) संचालित करता है, जहां 150 से 200 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।

ट्रम्प प्रशासन ने दबाव की राजनीति को और धार देने के लिए व्हाइट हाउस के सोशल मीडिया हैंडल से एक प्रतीकात्मक तस्वीर भी पोस्ट की, जिसमें ग्रीनलैंड को दो रास्तों के बीच खड़ा दिखाया गया—एक रास्ता अमेरिका की ओर, दूसरा चीन-रूस की ओर। इस पोस्ट को ग्रीनलैंड पर मनोवैज्ञानिक दबाव के तौर पर देखा जा रहा है।

इसके जवाब में ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री Jens-Frederik Nielsen ने दो टूक कहा कि अगर कभी अमेरिका और डेनमार्क में से किसी एक को चुनने की नौबत आई, तो ग्रीनलैंड डेनमार्क को ही चुनेगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी संसद में ‘ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट’ जैसा विवादास्पद बिल भी पेश किया जा चुका है।

कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फ और आर्कटिक का इलाका नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और भविष्य की मिसाइल जंग का अहम मोहरा बन चुका है। भारत समेत पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि ट्रम्प का गोल्डन डोम सपना ग्रीनलैंड की संप्रभुता से टकराकर किस दिशा में जाता है।

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