आज की तेज़ रफ्तार डिजिटल दुनिया में मोबाइल, टैबलेट और टीवी बच्चों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक, हर गतिविधि किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ी है। लेकिन यही सुविधा जब सीमा लांघने लगती है, तो बच्चों के व्यवहार में ऐसे बदलाव दिखने लगते हैं, जिन्हें अक्सर माता-पिता सामान्य मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
अगर बच्चा छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ने लगा है, बात-बात पर रोना या गुस्सा करना उसकी आदत बनती जा रही है, तो इसके पीछे ज़्यादा स्क्रीन टाइम एक बड़ी वजह हो सकती है। लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों का मानसिक संतुलन, भावनात्मक प्रतिक्रिया और दिनचर्या प्रभावित होने लगती है।
सबसे पहले असर नींद पर पड़ता है। मोबाइल और टीवी से निकलने वाली ब्लू लाइट बच्चों के दिमाग को यह संकेत नहीं लेने देती कि अब आराम का समय है। मेलाटोनिन हार्मोन का संतुलन बिगड़ने से नींद देर से आती है और नींद पूरी न होने पर बच्चा अगले दिन थका-थका और चिड़चिड़ा महसूस करता है।
धीरे-धीरे इसका असर सामाजिक व्यवहार पर भी दिखने लगता है। जब बच्चा ज़्यादातर समय स्क्रीन में डूबा रहता है, तो वह परिवार और दोस्तों से बातचीत कम करने लगता है। सोशल स्किल्स कमजोर होती हैं, भावनात्मक जुड़ाव घटता है और यही अकेलापन झुंझलाहट और गुस्से में बदल जाता है।
स्क्रीन टाइम बढ़ने का एक बड़ा नुकसान शारीरिक गतिविधि की कमी भी है। खेल-कूद, दौड़-भाग और आउटडोर एक्टिविटी से दूर रहने पर बच्चों की एनर्जी सही तरीके से बाहर नहीं निकल पाती। नतीजा यह होता है कि बच्चा अंदर ही अंदर बेचैन रहता है और उसका व्यवहार असंतुलित हो जाता है।
इसके साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि बच्चा क्या देख रहा है। तेज़ आवाज़, हिंसक या जरूरत से ज्यादा उत्तेजक कंटेंट बच्चों के दिमाग को ओवरलोड कर देता है। ऐसा कंटेंट देखने के बाद बच्चों में जिद, गुस्सा और आक्रामकता बढ़ सकती है।
समाधान स्क्रीन को पूरी तरह छीनना नहीं, बल्कि उसे संतुलित करना है। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय करें और सोने से कम से कम एक घंटा पहले सभी डिजिटल डिवाइस बंद कर दें। उनकी दिनचर्या में आउटडोर गेम्स, किताबें पढ़ना, क्रिएटिव एक्टिविटी और फैमिली के साथ समय बिताना ज़रूरी बनाएं। सबसे अहम बात यह है कि माता-पिता खुद भी स्क्रीन का सीमित इस्तेमाल करें, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं।