नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ में आई तेज गिरावट ने निवेशकों को चौंका जरूर दिया, लेकिन बाजार के जानकार इसे डराने वाली घटना नहीं मान रहे। खास बात यह रही कि ईटीएफ की कीमतों में गिरावट फिजिकल और फ्यूचर्स मार्केट की तुलना में कहीं ज्यादा दिखी। यही वजह है कि कई निवेशकों के मन में सवाल उठा कि जब फिजिकल गोल्ड-सिल्वर में सीमित कमजोरी है, तो ईटीएफ इतने तेज क्यों टूटे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अस्थायी करेक्शन है और इसे दीर्घकालिक नुकसान के संकेत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
गोल्ड ईटीएफ में सबसे ज्यादा दबाव देखा गया, जहां कुछ फंड्स करीब 9 प्रतिशत तक फिसल गए। वहीं सिल्वर ईटीएफ में गिरावट और भी तीखी रही, कुछ स्कीम्स में 13 प्रतिशत से ज्यादा की टूट दर्ज की गई। इसके उलट फ्यूचर्स मार्केट में गिरावट काफी सीमित रही। यानी वास्तविक कीमतों और ईटीएफ वैल्यू के बीच का अंतर अचानक बढ़ गया, जिसने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।
विशेषज्ञों के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ईटीएफ कई बार फिजिकल और इंटरनेशनल कीमतों से ऊपर प्रीमियम पर ट्रेड करने लगते हैं। पिछले कुछ महीनों में गोल्ड और सिल्वर में आई तेज तेजी के बाद ईटीएफ में ओवरवैल्यूएशन बन गया था। अब जब मुनाफावसूली शुरू हुई और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों में थोड़ी नरमी आई, तो ईटीएफ ने ज्यादा तेजी से करेक्शन दिखाया। इस गिरावट ने दरअसल ईटीएफ की कीमतों को फिजिकल और इंटरनेशनल मार्केट के करीब लाने का काम किया है।
बाजार एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि ईटीएफ और फिजिकल गोल्ड-सिल्वर एक जैसे व्यवहार नहीं करते। सामान्य और स्थिर बाजार में दोनों करीब-करीब एक-दूसरे को ट्रैक करते हैं, लेकिन जब वोलैटिलिटी बढ़ती है, तो ईटीएफ में उतार-चढ़ाव ज्यादा तेज हो जाता है। खासतौर पर उन निवेशकों के लिए यह गिरावट ज्यादा चौंकाने वाली रही, जिन्होंने हाल के महीनों में ऊंचे भाव पर ईटीएफ खरीदे थे। वास्तव में यह करेक्शन कीमतों के संतुलन की प्रक्रिया जैसा है।
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि इस गिरावट को स्थायी नुकसान समझना गलत होगा। कमोडिटी मार्केट में तेज रैली के बाद इस तरह के करेक्शन आम हैं। जोखिम तब बढ़ता है, जब निवेश बिना स्पष्ट उद्देश्य और सही एंट्री-एग्जिट रणनीति के किया जाता है। ईटीएफ अक्सर स्थिरता का भ्रम पैदा करते हैं, जबकि इनमें भी शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव काफी तीखा हो सकता है।
निवेशकों के लिए सलाह यही है कि गोल्ड और सिल्वर को लंबी अवधि के नजरिए से देखें। गोल्ड अब भी पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन का मजबूत जरिया बना हुआ है, जबकि सिल्वर में धीरे-धीरे निवेश के लिए एसटीपी बेहतर विकल्प माना जा रहा है। कुल मिलाकर, इन दोनों मेटल्स में निवेश पोर्टफोलियो के 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। मौजूदा गिरावट घबराने की वजह नहीं, बल्कि समझदारी से रणनीति बनाने का मौका मानी जा सकती है।