अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से लगभग दो साल दूर रहने के दौरान ईशान किशन के भीतर एक अलग ही लड़ाई चल रही थी। बाहर बैठकर उन्होंने सिर्फ इंतज़ार नहीं किया, बल्कि खुद से सबसे कठिन सवाल पूछा—क्या मैं दोबारा इंडिया की जर्सी पहनकर उसी स्तर पर खेल पाऊंगा? यही सवाल उनकी वापसी की नींव बना। जवाब उन्हें खुद पर भरोसे के रूप में मिला और उसी भरोसे का नतीजा दिखा India vs New Zealand के दूसरे टी20 में, जब उन्होंने महज़ 32 गेंदों में 76 रनों की तूफानी पारी खेलकर मैच का रुख ही पलट दिया। 209 रनों का विशाल लक्ष्य भारत ने 16वें ओवर में ही हासिल कर लिया और वापसी के इस मैच में ईशान ने बता दिया कि वह क्यों खास हैं।
प्लेयर ऑफ द मैच बनने के बाद जब उनसे पूछा गया कि टीम से बाहर किए जाने के दौर में उन्होंने खुद से क्या कहा था, तो ईशान का जवाब बेहद सधा हुआ और आत्मविश्वास से भरा था। उन्होंने कहा कि उन्होंने खुद से सिर्फ यही पूछा था कि क्या मैं फिर से यह कर सकता हूं, और इसका जवाब उन्हें अंदर से बिल्कुल साफ मिला। यही साफ जवाब उन्हें आगे बढ़ाता गया।
ईशान की यह वापसी किसी तात्कालिक चमत्कार का नतीजा नहीं थी, बल्कि घरेलू क्रिकेट में खुद को फिर से गढ़ने की कहानी थी। उन्होंने बुची बाबू ट्रॉफी और डीवाई पाटिल जैसे टूर्नामेंट्स में खेलकर नीचे से शुरुआत की। झारखंड के लिए उन्होंने ऐसा सीजन खेला, जिसमें 500 से ज्यादा रन बनाए और टीम को सैयद मुश्ताक अली नेशनल टी20 का पहला खिताब जिताया। यह सिर्फ रन नहीं थे, बल्कि आत्मविश्वास की ईंटें थीं, जिन पर उनकी वापसी टिकी थी।
ईशान खुद मानते हैं कि उनका लक्ष्य बहुत सीधा था—रन बनाना। उनके मुताबिक, कभी-कभी अपने लिए खेलना जरूरी होता है, अपने सवालों के जवाब ढूंढने के लिए। वह जानना चाहते थे कि उनकी बल्लेबाज़ी कहां खड़ी है और क्या वह अब भी भारत के लिए खेलने के काबिल हैं। डोमेस्टिक क्रिकेट में रन बनाकर उन्होंने न सिर्फ खुद को जवाब दिया, बल्कि चयनकर्ताओं को भी साफ संदेश दिया।
अपनी मैच जिताऊ पारी को लेकर ईशान ने कहा कि वह किसी रिस्की शॉट के बारे में नहीं सोच रहे थे। उनका फोकस सिर्फ उस दिन के काम पर था। वह सही माइंडसेट में थे और बस अच्छा क्रिकेट खेलना चाहते थे। आउट होना भी उन्हें डराने वाला नहीं था, क्योंकि असली मकसद खुद को साबित करना था, न कि आंकड़ों का पीछा करना।
ईशान की इस पारी ने कप्तान Suryakumar Yadav को भी खासा प्रभावित किया। सूर्या ने खुले दिल से कहा कि उन्होंने दबाव वाले मैच में किसी बल्लेबाज़ को इस तरह हावी होते कम ही देखा है। खुद सूर्यकुमार के लिए भी यह मैच राहत भरा रहा, क्योंकि 23 पारियों के बाद उन्होंने अपनी पहली हाफ-सेंचुरी बनाई। उन्होंने माना कि नेट्स में की गई मेहनत, परिवार और दोस्तों के साथ बिताया गया समय और मानसिक रूप से मिला ब्रेक—इन सबका असर अब मैदान पर दिख रहा है।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ एक मैच या एक पारी की कहानी नहीं थी। यह कहानी थी दो साल के संदेह, मेहनत और आत्मविश्वास की—जिसका जवाब ईशान किशन ने शब्दों में नहीं, बल्ले से दिया।