आपका सवाल बेहद अहम है और सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि जो आप महसूस कर रही हैं, वह कमजोरी नहीं बल्कि एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है। 12 साल तक किसी ऐसे व्यक्ति की देखभाल करना, जिसकी मानसिक स्थिति कभी स्थिर रहती है तो कभी अचानक बिगड़ जाती है, अपने आप में एक लंबी भावनात्मक यात्रा है। इस दौरान थक जाना, खालीपन महसूस करना या खुद के डिप्रेशन में जाने का डर होना बिल्कुल असामान्य नहीं है।
बायपोलर डिसऑर्डर जैसी मानसिक बीमारी में समस्या सिर्फ दवाइयों तक सीमित नहीं रहती। कभी बहुत ज्यादा ऊर्जा, कभी गहरी उदासी, कभी काम से पूरी तरह कट जाना—ये सब स्थितियां न सिर्फ मरीज बल्कि उसके साथ रहने वाले व्यक्ति को भी लगातार तनाव में रखती हैं। कई बार केयर करने वाला खुद यह समझ ही नहीं पाता कि कब उसकी अपनी मानसिक सेहत धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
मनोविज्ञान में इसे केयरगिवर स्ट्रेस कहा जाता है। यानी किसी बीमार व्यक्ति की देखभाल करते-करते केयर करने वाला खुद थकान, चिड़चिड़ेपन, उदासी, एंग्जायटी और भावनात्मक बर्नआउट का शिकार हो जाता है। फर्क बस इतना है कि समाज इस थकान को अक्सर पहचानता ही नहीं। खासकर भारत जैसे समाज में पत्नी से यह उम्मीद की जाती है कि वह चुपचाप सब संभाल ले, बिना शिकायत किए।
आपके मामले में समस्या और गहरी इसलिए है क्योंकि मानसिक बीमारी बाहर से दिखाई नहीं देती। लोग समझ नहीं पाते कि आप किस दबाव में जी रही हैं। पति के मूड, दवाइयों, नींद, काम और रिलैप्स के डर—इन सबकी निगरानी धीरे-धीरे आपकी पूरी जिंदगी बन गई है। ऐसे में खुद के लिए जगह खत्म हो जाना स्वाभाविक है।
यह भी समझना ज़रूरी है कि केयरगिवर स्ट्रेस और डिप्रेशन एक ही चीज़ नहीं हैं, लेकिन अगर लंबे समय तक इस स्ट्रेस को नज़रअंदाज़ किया जाए तो यह क्लिनिकल डिप्रेशन में बदल सकता है। लगातार थकान, मन भारी रहना, खुद के लिए कुछ करने का मन न होना—ये चेतावनी के संकेत हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए।
सबसे पहली बात यह मानना ज़रूरी है कि आप सिर्फ पत्नी हैं, डॉक्टर नहीं। सपोर्ट देना आपकी भूमिका है, हर चीज़ को कंट्रोल करना नहीं। हर लो-फेज आपकी परीक्षा नहीं है और हर बार मजबूत बने रहना ज़रूरी भी नहीं। मदद मांगना असफलता नहीं, समझदारी है।
अपने लिए समय निकालना कोई लग्ज़री नहीं बल्कि ज़रूरत है। हफ्ते में कुछ दिन, सिर्फ 30 मिनट भी, जहां आप खुद के साथ रहें—बिना अपराधबोध के। यह समय आपकी मानसिक बैटरी को चार्ज करता है। इसके अलावा किसी एक ऐसे व्यक्ति को चुनें जिससे आप बिना जजमेंट के अपनी थकान, गुस्सा और डर साझा कर सकें। कभी-कभी सिर्फ सुने जाना भी बहुत राहत देता है।
अगर लगे कि हालात आपके हाथ से फिसल रहे हैं, तो प्रोफेशनल मदद लेने में बिल्कुल संकोच न करें। थेरेपी या काउंसिलिंग सिर्फ “बीमार” लोगों के लिए नहीं होती, बल्कि उनके लिए भी होती है जो लंबे समय से किसी और को संभालते-संभालते खुद टूट रहे हैं।
याद रखिए—
आपका ठीक रहना आपके पति की रिकवरी का हिस्सा है।
खुद को बचाना स्वार्थ नहीं, बुनियादी जरूरत है।
और सबसे जरूरी बात—आप अकेली नहीं हैं, और मदद मांगना आपका अधिकार है।