विदेश में पढ़ाई का सपना आज लाखों भारतीय परिवार देखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बिना एजुकेशन लोन के यह सपना अक्सर अधूरा रह जाता है। ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, हेल्थ इंश्योरेंस, ट्रैवल और रोजमर्रा की जरूरतें मिलकर कुल लागत को इतना बढ़ा देती हैं कि वर्षों की सेविंग्स भी कम पड़ जाती हैं। यही वजह है कि बैंक विदेशी पढ़ाई के लिए लोन देने में ज्यादा हिचकिचाते नहीं हैं, खासकर तब जब यूनिवर्सिटी और देश उनके लिए परिचित हों। लेकिन बैंक की यह तत्परता आपके भविष्य की गारंटी नहीं होती—फैसला आखिरकार आपको ही करना होता है।
अक्सर एजुकेशन लोन की बातचीत इस सवाल पर सिमट जाती है कि कितनी रकम मिल जाएगी और पात्रता क्या है। यह हिस्सा सबसे आसान होता है। असली चुनौती तब शुरू होती है जब लोन चुकाने की बारी आती है। पढ़ाई के दौरान और उसके बाद कुछ समय तक मोराटोरियम जरूर मिलता है, लेकिन उसके खत्म होते ही ईएमआई शुरू हो जाती है। नौकरी मिली या नहीं, सैलरी कितनी है—ईएमआई इन सवालों का इंतजार नहीं करती। कई परिवार यह मानकर चलते हैं कि डिग्री मिलते ही अच्छी नौकरी लग जाएगी, लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो वही लोन मानसिक तनाव और आर्थिक दबाव का कारण बन जाता है।
टैक्स छूट का पहलू भी अक्सर भ्रम पैदा करता है। एजुकेशन लोन के ब्याज पर आयकर की धारा 80ई के तहत राहत जरूर मिलती है, जिससे कुल लागत कुछ कम होती है। लेकिन इससे हर महीने की ईएमआई कम नहीं होती। करियर के शुरुआती सालों में आमदनी अस्थिर रहती है—कभी इंटर्नशिप, कभी कॉन्ट्रैक्ट जॉब, कभी खाली समय। ऐसे में टैक्स बेनिफिट कागजों में भले अच्छे लगें, कैश फ्लो की परेशानी बनी रहती है।
एजुकेशन लोन का सबसे बड़ा जोखिम पढ़ाई से नहीं, बल्कि नौकरी से जुड़ा होता है। किस देश में किस कोर्स के बाद नौकरी के मौके हैं, वीज़ा नियम क्या कहते हैं, पोस्ट-स्टडी वर्क की सुविधा है या नहीं—इन सवालों के जवाब बेहद जरूरी हैं। सिर्फ यूनिवर्सिटी की रैंकिंग देखकर लोन लेना खतरनाक हो सकता है। Reserve Bank of India भी समय-समय पर चेतावनी देता रहा है कि भविष्य की अनुमानित कमाई के भरोसे भारी उधारी से बचना चाहिए।
एक और बड़ा जोखिम है करंसी का, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई छात्र सोचते हैं कि वे विदेश में कमाई करके लोन चुका देंगे, लेकिन हालात बदल सकते हैं—नौकरी में देरी, देश बदलना या भारत लौटना। अगर ईएमआई रुपये में देनी पड़ी और इस दौरान रुपया कमजोर हो गया, तो लोन का बोझ बिना बताए बढ़ जाता है।
बड़े एजुकेशन लोन में कोलैटरल की शर्त भी पूरे परिवार को जोखिम में डाल देती है। प्रॉपर्टी गिरवी रखना या माता-पिता का को-बॉरोअर बनना मतलब यह कि जिम्मेदारी सिर्फ छात्र की नहीं रहती। ईएमआई में चूक होने पर परिवार की क्रेडिट हिस्ट्री और संपत्ति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
एजुकेशन लोन लेना गलत नहीं है, लेकिन यह फैसला हल्के में लेने लायक भी नहीं। लोन की मंजूरी मिलना खुशी की बात है, पर असली परीक्षा चुकाने के वक्त होती है। नौकरी के वास्तविक मौके, शुरुआती कमाई, करंसी रिस्क और परिवार पर पड़ने वाले असर—इन सबको ठंडे दिमाग से तौलकर लिया गया फैसला ही लंबे समय के तनाव से बचा सकता है।