भारत सरकार इलेक्ट्रिक व्हीकल और क्लीन एनर्जी के मोर्चे पर एक निर्णायक कदम उठाने की तैयारी में है। प्रस्तावित नई सब्सिडी योजना के तहत देश में लिथियम और निकेल प्रोसेसिंग प्लांट लगाने वाली कंपनियों को 15 प्रतिशत तक की कैपिटल सब्सिडी देने का प्लान है। इसका सीधा मकसद बैटरी मटीरियल की सप्लाई चेन को मजबूत करना, आयात पर निर्भरता घटाना और खनिज प्रसंस्करण में चीन के दबदबे को चुनौती देना है।
सरकार की सोच साफ है—2030 तक ईवी को बड़े पैमाने पर अपनाने के लक्ष्य के लिए घरेलू स्तर पर लिथियम और निकेल की प्रोसेसिंग अनिवार्य है। फिलहाल भारत में इन अहम खनिजों की प्रोसेसिंग क्षमता सीमित है, जबकि बैटरी निर्माण के लिए यही सबसे बड़ी जरूरत है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक कारों की बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत और दोपहिया वाहनों में 80 प्रतिशत तक पहुंचाई जाए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कच्चे माल से लेकर बैटरी तक की पूरी वैल्यू चेन देश के भीतर विकसित करना जरूरी माना जा रहा है।
प्रस्तावित योजना के अनुसार, जो परियोजनाएं 1 अप्रैल 2026 या उसके बाद परिचालन शुरू करेंगी, उन्हें यह प्रोत्साहन मिलेगा और योजना अगले पांच वर्षों तक लागू रहेगी। हालांकि सरकार ने सब्सिडी के लिए सख्त मानक भी तय किए हैं, ताकि केवल बड़े और प्रभावी प्रोजेक्ट्स को ही फायदा मिले। लिथियम प्रोसेसिंग प्लांट के लिए न्यूनतम क्षमता 30,000 मीट्रिक टन और निकेल प्रोसेसिंग के लिए 50,000 मीट्रिक टन तय की गई है। साथ ही सब्सिडी की अधिकतम सीमा भी बांधी गई है—लिथियम के मामले में सालाना नेट सेल्स टर्नओवर का 40 प्रतिशत और निकेल के लिए 25 प्रतिशत तक।
सब्सिडी का भुगतान भी एकमुश्त नहीं होगा। सरकार इसे चरणबद्ध तरीके से जारी करेगी और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि प्लांट का उपयोग तय किए गए न्यूनतम स्तर तक हो रहा है या नहीं। इस मॉडल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सिर्फ कागजी निवेश नहीं, बल्कि वास्तविक उत्पादन और क्षमता उपयोग हो।
कुल मिलाकर, यह पहल न सिर्फ निवेश को आकर्षित करेगी बल्कि भारत के ग्रीन एनर्जी मिशन को भी ठोस आधार देगी। लिथियम और निकेल प्रोसेसिंग में आत्मनिर्भरता बढ़ने से बैटरी की लागत घटने, ईवी सस्ती होने और भारत के ग्लोबल ईवी हब बनने की राह आसान होने की उम्मीद है।