रील्स के शोर से देवालय परेशान: मर्यादित वस्त्र अनिवार्य, मंदिरों में फोटो-वीडियो पर सख्ती, छत्तीसगढ़ में पहली बार ऐसे हालात

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रायपुर। सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम रील्स के बढ़ते चलन ने अब देवालयों की शांति और गरिमा को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। छत्तीसगढ़ में पहली बार ऐसी स्थिति सामने आई है, जब मंदिर प्रबंधन को लाउडस्पीकर के जरिए श्रद्धालुओं से मर्यादित वस्त्र पहनने और फोटो-वीडियो से परहेज करने की अपील करनी पड़ रही है। राजधानी रायपुर के महादेवघाट स्थित हाटकेश्वरनाथ मंदिर में दिसंबर 2025 से यह व्यवस्था लागू कर दी गई है, जहां लगातार बढ़ते दिखावे और शूटिंग के चलन से पूजा-अर्चना बाधित हो रही थी।

राजधानी के ही बूढ़ापारा स्थित गणेश मंदिर सहित कई अन्य मंदिरों के मुख्य द्वार पर अब स्पष्ट नोटिस चस्पा किए गए हैं। इनमें श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया है कि वे मंदिर में प्रवेश के समय शालीन और मर्यादित वस्त्रों का चयन करें तथा परिसर में अनुशासन बनाए रखें। यह पहल अब केवल रायपुर तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तरह के नियम लागू किए जा रहे हैं।

धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर में हालात और भी गंभीर हो गए थे। प्राचीन दीवारों और ऐतिहासिक संरचना के चलते यहां बड़ी संख्या में लोग वेडिंग और प्री-वेडिंग फोटोशूट के लिए पहुंचने लगे थे। कई बार पूजा-पाठ के बीच ही कैमरे और वीडियो शूट शुरू हो जाते थे, जिससे न केवल श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत होती थीं, बल्कि मंदिर की पवित्रता भी प्रभावित हो रही थी। हालात बिगड़ते देख मंदिर प्रबंधन को यहां पूरी तरह से वीडियोग्राफी और शूटिंग पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।

महादेवघाट हाटकेश्वरनाथ मंदिर के पुजारी पं. सुरेशगिरी गोस्वामी के अनुसार, लाउडस्पीकर के माध्यम से भक्तों से शालीन कपड़े पहनने का निवेदन किया जा रहा है। लगभग एक माह पहले यह व्यवस्था शुरू की गई थी, क्योंकि लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ लोग मंदिर को भी सोशल मीडिया कंटेंट बनाने की जगह समझने लगे हैं। उनका कहना है कि देवालय में आस्था और मर्यादा सर्वोपरि होनी चाहिए।

दरअसल, देश के कई प्रतिष्ठित मंदिरों में पहले से ही सख्त ड्रेस कोड लागू है। महाकालेश्वर मंदिर जैसे मंदिरों में गर्भगृह में प्रवेश के लिए पारंपरिक और शालीन परिधान अनिवार्य माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ के मंदिरों में अभी किसी खास ड्रेस कोड की बाध्यता नहीं है, लेकिन वस्त्रों को लेकर सामान्य दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। मंदिर प्रबंधन का साफ कहना है कि रील्स और फोटो के लिए जिस तरह के आपत्तिजनक कपड़ों में कुछ युवा आते हैं, उससे आराधना में बाधा पड़ती है और धार्मिक वातावरण प्रभावित होता है।

भोरमदेव मंदिर के पुजारी पं. आशीष शास्त्री के मुताबिक, लगातार मिल रही शिकायतों के बाद यह निर्णय लिया गया। उनका कहना है कि यह चलन हमारी संस्कृति पर सीधा प्रहार है और देवालयों को सोशल मीडिया शूट का मंच बनने से बचाना जरूरी है। इसी सोच के साथ मंदिर परिसर में प्री-वेडिंग शूट, रील्स और फोटो-वीडियो पर पूरी तरह रोक लगाई गई है।

कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ के मंदिरों में उठाया गया यह कदम केवल अनुशासन का नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और मर्यादा की रक्षा का प्रयास माना जा रहा है। देवालयों का संदेश साफ है—भक्ति के लिए आएं, दिखावे के लिए नहीं।

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