आज के दौर में हाई ब्लड प्रेशर आम समस्या बन चुका है, लेकिन हर हाई बीपी एक जैसा नहीं होता। ज्यादातर मामलों में लोग जिस हाई बीपी से परिचित हैं, वह प्राइमरी हाइपरटेंशन होता है, जबकि सेकेंडरी हाइपरटेंशन उससे बिल्कुल अलग और ज्यादा गंभीर स्थिति हो सकती है। इसमें ब्लड प्रेशर अपने आप नहीं बढ़ता, बल्कि शरीर में मौजूद किसी दूसरी बीमारी या मेडिकल कारण की वजह से अचानक और तेज़ी से बढ़ता है। यही कारण है कि कई बार नियमित दवाइयां लेने के बावजूद भी बीपी कंट्रोल में नहीं आता और मरीज परेशान रहता है।
सेकेंडरी हाइपरटेंशन को समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अगर इसकी जड़ पकड़ ली जाए तो इस पर प्रभावी तरीके से काबू पाया जा सकता है। यह स्थिति अक्सर किडनी से जुड़ी बीमारियों, हार्मोनल असंतुलन, थायरॉइड या एड्रिनल ग्रंथि की गड़बड़ी, नींद के दौरान सांस रुकने की समस्या या कुछ खास दवाइयों के लंबे समय तक सेवन से पैदा होती है। आमतौर पर यह समस्या अचानक सामने आती है और बीपी का स्तर सामान्य से कहीं ज्यादा होता है, जो इसे प्राइमरी हाइपरटेंशन से अलग बनाता है।
इसके लक्षण कई बार सामान्य हाई बीपी जैसे ही लगते हैं, लेकिन कुछ संकेत ऐसे होते हैं जो सतर्क कर देते हैं। तेज सिरदर्द, चक्कर आना, सीने में जकड़न, सांस फूलना, आंखों के सामने धुंधलापन और बार-बार दवाइयां बदलने के बाद भी बीपी का कंट्रोल न होना सेकेंडरी हाइपरटेंशन की ओर इशारा कर सकता है। ऐसे मामलों में लापरवाही करना खतरनाक साबित हो सकता है।
सही पहचान के लिए जांच सबसे अहम कड़ी है। डॉक्टर आमतौर पर ब्लड और यूरिन टेस्ट, किडनी फंक्शन जांच, हार्मोन लेवल की टेस्टिंग और जरूरत पड़ने पर इमेजिंग जांच की सलाह देते हैं। इन जांचों का मकसद यही होता है कि बीपी बढ़ने के असली कारण को पकड़ा जा सके, क्योंकि बिना कारण जाने किया गया इलाज अक्सर अधूरा साबित होता है।
सेकेंडरी हाइपरटेंशन का इलाज सीधे उसके कारण पर निर्भर करता है। अगर समस्या किडनी या हार्मोन से जुड़ी है तो पहले उस बीमारी का उपचार किया जाता है। इसके साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव भी उतना ही जरूरी होता है। नमक का सीमित सेवन, संतुलित आहार, वजन को नियंत्रित रखना, नियमित व्यायाम, धूम्रपान और शराब से दूरी—ये सभी उपाय ब्लड प्रेशर को संभालने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। कई बार डॉक्टर दवाइयों में बदलाव भी करते हैं ताकि इलाज ज्यादा प्रभावी हो सके।
समय पर इलाज न किया जाए तो सेकेंडरी हाइपरटेंशन गंभीर जटिलताओं का रूप ले सकता है। हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी फेल्योर जैसी स्थितियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। इसलिए अगर ब्लड प्रेशर सामान्य तरीकों से काबू में नहीं आ रहा हो, तो इसे हल्के में न लें। सही समय पर जांच और इलाज न सिर्फ बीपी कंट्रोल करता है, बल्कि भविष्य में होने वाले बड़े जोखिमों से भी बचाव करता है।
(डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी तरह की दवा, जांच या उपचार शुरू करने से पहले योग्य डॉक्टर या विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)