अब पैकेट के सामने दिखेगी सच्चाई? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर करें विचार

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हम में से ज्यादातर लोग जब चिप्स, बिस्किट या नमकीन खरीदते हैं तो पैकेट के पीछे लिखी न्यूट्रिशन टेबल पढ़ने की जहमत नहीं उठाते। शुगर कितनी है, नमक कितना है, फैट कितना है—ये जानकारी अक्सर अनदेखी रह जाती है। इसी आदत को बदलने के लिए अब बड़ा कदम उठ सकता है।

Supreme Court of India ने हाल ही में Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) और केंद्र सरकार से कहा है कि पैकेज्ड फूड पर “फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल” लागू करने पर गंभीरता से विचार किया जाए। मतलब, अब जरूरी जानकारी पैकेट के सामने बड़े और आसान संकेतों में दिख सकती है—ताकि खरीदते समय ही उपभोक्ता समझ सके कि वह जो खाने जा रहा है, वह हेल्दी है या अनहेल्दी।

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग क्या है?

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) ऐसी व्यवस्था है जिसमें पैकेट के सामने ही शुगर, नमक और फैट जैसी मुख्य न्यूट्रिशनल जानकारी को सरल भाषा, रंग या ग्राफिक्स के जरिए दिखाया जाता है। अभी ये जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में एक टेबल के रूप में होती है, जिसे पढ़ना और समझना हर किसी के लिए आसान नहीं होता।

अगर सामने ही “हाई शुगर” या “हाई सॉल्ट” जैसी चेतावनी लिखी हो या रेड-ग्रीन रंगों से संकेत दिया गया हो, तो उपभोक्ता एक नजर में फैसला कर सकता है।

यह क्यों जरूरी है?

देश में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज जैसी लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इन बीमारियों की बड़ी वजह अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड में मौजूद ज्यादा शुगर, नमक और अनहेल्दी फैट है।

जब जानकारी स्पष्ट और सामने होगी, तो लोग खरीदने से पहले सोचेंगे। इससे हेल्दी विकल्प चुनना आसान होगा और अनहेल्दी चीजों का अत्यधिक सेवन कम किया जा सकेगा।

इससे फायदा क्या होगा?

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग न्यूट्रिशन की जटिल जानकारी को सरल बना देती है। उदाहरण के लिए, अगर किसी प्रोडक्ट पर लाल रंग का संकेत है कि इसमें शुगर ज्यादा है, तो उपभोक्ता उसे सीमित मात्रा में लेने का निर्णय कर सकता है। वहीं ग्रीन लेबल संकेत देगा कि यह अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प है।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि लेबलिंग सिर्फ जागरूकता देती है, बीमारी से पूरी तरह बचाने की गारंटी नहीं। लेकिन यह तय है कि उपभोक्ता का फैसला “जानकारी के आधार पर” होगा।

कौन से तत्व सबसे ज्यादा नुकसानदायक?

हर पैकेज्ड फूड हानिकारक नहीं होता, लेकिन ज्यादा मात्रा में ट्रांस फैट, रिफाइंड शुगर, अत्यधिक सोडियम और प्रोसेस्ड एडिटिव्स शरीर के लिए खतरनाक हो सकते हैं। इनका लगातार सेवन मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और हृदय रोग का जोखिम बढ़ाता है।

कितना सुरक्षित है पैकेज्ड फूड?

विशेषज्ञों की राय है कि पैकेज्ड फूड को सीमित मात्रा में, कभी-कभार या खास मौकों पर ही लेना चाहिए। रोजमर्रा की डाइट में ताजे फल-सब्जियां, साबुत अनाज, बिना नमक वाले नट्स और घर का बना खाना बेहतर विकल्प हैं। ये शरीर को जरूरी विटामिन, फाइबर और मिनरल देते हैं और अतिरिक्त शुगर-सोडियम से बचाते हैं।

आगे क्या?

अब नजर FSSAI के फैसले पर है। यदि फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग लागू होती है, तो यह भारतीय फूड इंडस्ट्री और उपभोक्ता व्यवहार—दोनों में बड़ा बदलाव ला सकती है। पैकेट के सामने दिखने वाली छोटी-सी चेतावनी, भविष्य में बड़ी बीमारियों से बचाव का जरिया बन सकती है।

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