मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों की धड़कनें तेज कर दी हैं। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी टकराव का असर अब सीधे एशियाई शेयर बाजारों पर दिखाई दे रहा है। सोमवार को एशिया के ज्यादातर बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जहां कुछ इंडेक्स दबाव में रहे तो कुछ फ्लैट कारोबार करते नजर आए। निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल साफ झलक रहा है।
जापान का प्रमुख सूचकांक नikkei बड़ी गिरावट के साथ कारोबार करता दिखा। इंडेक्स 1,329 अंकों यानी करीब 2.29% की गिरावट के साथ 56,700 के स्तर पर फिसल गया। वहीं दक्षिण कोरिया का KOSPI तो और भी ज्यादा दबाव में दिखा। यह 250 अंक यानी 4.03% गिरकर 6,000 के स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट बताती है कि निवेशक जोखिम से बचने की रणनीति अपना रहे हैं और सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं।
चीन और हॉन्गकॉन्ग के बाजार अपेक्षाकृत स्थिर नजर आए। शंघाई कंपोजिट इंडेक्स 4,180 के आसपास और हैंगसेंग इंडेक्स 26,070 के स्तर पर लगभग सपाट कारोबार करता दिखा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भू-राजनीतिक तनाव लंबा खिंचता है, तो इन बाजारों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
भारत में होली के अवसर पर शेयर बाजार बंद रहे, लेकिन पिछले कारोबारी दिन यानी 2 मार्च को यहां भी भारी गिरावट दर्ज की गई थी। सेंसेक्स 1,048 अंक यानी 1.29% गिरकर 80,239 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 313 अंक यानी 1.24% टूटकर 24,866 पर आ गया। यह गिरावट दर्शाती है कि वैश्विक घटनाक्रम का असर भारतीय बाजार पर भी तेज़ी से पड़ रहा है।
अमेरिकी बाजारों में हालांकि मिला-जुला रुख देखने को मिला। टेक आधारित नैस्डैक कंपोजिट 0.36% की बढ़त के साथ 22,274 पर बंद हुआ। S&P 500 मामूली 2 अंकों की बढ़त के साथ 6,881 पर रहा, जबकि डाउ जोन्स 73 अंक यानी 0.15% गिरकर 48,904 पर बंद हुआ। अमेरिकी निवेशकों का रुख सतर्क लेकिन संतुलित दिखा।
विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी इस अस्थिरता को दर्शा रही हैं। 2 मार्च को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने 3,295 करोड़ रुपए के शेयर बेचे, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 8,593 करोड़ रुपए की खरीदारी कर बाजार को सहारा देने की कोशिश की। फरवरी में FIIs ने 11,002 करोड़ रुपए के शेयर खरीदे थे, जबकि जनवरी 2026 में उन्होंने 41,435 करोड़ रुपए की बिकवाली की थी। इसके उलट DIIs लगातार खरीदारी के जरिए बाजार को संभालते नजर आए।
पाकिस्तान का शेयर बाजार इस तनाव से सबसे ज्यादा प्रभावित दिखा। वहां KSE-30 इंडेक्स 9.73% यानी 4,996 अंक गिरकर 46,326 पर बंद हुआ। हालात इतने गंभीर थे कि भारी बिकवाली के कारण बाजार में 45 मिनट के लिए ट्रेडिंग रोकनी पड़ी और लोअर सर्किट लग गया। यह गिरावट क्षेत्रीय अस्थिरता की गंभीरता को दर्शाती है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। ब्रेंट क्रूड करीब 10% उछलकर 79 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। ऊर्जा क्षेत्र में इस उछाल का असर ऑटो और अन्य लागत-आधारित सेक्टरों पर साफ दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर हालात और बिगड़े, तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
तेल महंगा होने का सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ सकता है। अनुमान है कि दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 95 रुपए से बढ़कर 100 रुपए प्रति लीटर तक जा सकती है, जबकि डीजल 88 रुपए से बढ़कर 92 रुपए तक पहुंच सकता है। अगर ऐसा होता है तो महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ना तय है।
कुल मिलाकर, इजराइल-ईरान तनाव ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता की लहर पैदा कर दी है। निवेशक फिलहाल सतर्क हैं और हर नई खबर पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाते हैं, यह तय करेगा कि बाजारों में स्थिरता लौटेगी या उतार-चढ़ाव और तेज होगा।