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पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल के दामों में भारी उछाल, पेट्रोल 336 और डीजल 321 रुपये लीटर; मिडिल ईस्ट तनाव का असर

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मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और वैश्विक तेल बाजार में आई उथल-पुथल का असर अब सीधे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। पाकिस्तान सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी कर दी है। इस फैसले के बाद पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल दोनों ही आम लोगों की पहुंच से और दूर हो गए हैं।

सरकार द्वारा घोषित नई कीमतों के अनुसार पेट्रोल में लगभग 55 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। इसके बाद पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत बढ़कर 335.86 रुपये प्रति लीटर हो गई है, जबकि डीजल 321.17 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में की गई है जब देश पहले से ही महंगाई और आर्थिक संकट से जूझ रहा है।

पाकिस्तान सरकार का कहना है कि यह फैसला मजबूरी में लेना पड़ा है। सरकार के मुताबिक अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध की स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। वैश्विक बाजार में तेल के दाम बढ़ने का सीधा असर पाकिस्तान जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ रहा है।

कीमतों में बढ़ोतरी की खबर जैसे ही सामने आई, पाकिस्तान के बड़े शहरों में पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ जमा हो गई। लाहौर, कराची और इस्लामाबाद जैसे शहरों में लोग बड़ी संख्या में पेट्रोल पंपों पर पहुंच गए और घंटों तक लाइन में खड़े रहे। कई लोगों को आशंका है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की किल्लत भी हो सकती है, इसलिए लोग पहले से ही ईंधन भरवाने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी बीच पेट्रोल की कमी और जमाखोरी की खबरों को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि जो भी लोग पेट्रोल या डीजल का अवैध स्टॉक जमा करके बाजार में कृत्रिम संकट पैदा करने की कोशिश करेंगे, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने भी साफ किया है कि देश में फिलहाल पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त भंडार मौजूद है और घबराने की कोई जरूरत नहीं है।

सरकार का कहना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए तेल के भंडार को लंबे समय तक चलाने की योजना बनाई जा रही है। अधिकारियों के अनुसार मिडिल ईस्ट में तनाव कब खत्म होगा, यह कहना मुश्किल है। अगर हालात और बिगड़ते हैं तो वैश्विक सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है, इसलिए पाकिस्तान पहले से तैयारी कर रहा है।

दूसरी ओर वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान को लेकर दिए गए बयान के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ट्रम्प ने ईरान से बिना शर्त सरेंडर की मांग की थी, जिसके बाद वैश्विक बाजार में तनाव बढ़ गया। इसका असर यह हुआ कि क्रूड ऑयल WTI फ्यूचर्स की कीमत 12.2 प्रतिशत की तेजी के साथ लगभग 90.90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।

इस वैश्विक संकट का असर भारत में भी देखने को मिला है। भारत सरकार ने 7 मार्च से घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। अब दिल्ली में 14.2 किलोग्राम का घरेलू गैस सिलेंडर 913 रुपये में मिलेगा, जो पहले 853 रुपये का था। वहीं 19 किलोग्राम वाले कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में भी 115 रुपये का इजाफा किया गया है और अब इसकी कीमत 1883 रुपये हो गई है।

सरकार ने गैस की संभावित किल्लत को रोकने के लिए पहले ही कदम उठाना शुरू कर दिया है। 5 मार्च को इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल करते हुए देश की सभी ऑयल रिफाइनरी कंपनियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दिया गया है। सरकार का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण गैस सप्लाई प्रभावित हो सकती है, इसलिए घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।

इस आदेश के तहत रिफाइनरियों को कहा गया है कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन का उपयोग मुख्य रूप से रसोई गैस के उत्पादन के लिए करें। साथ ही इन गैसों की सप्लाई सरकारी तेल कंपनियों को देने का निर्देश भी दिया गया है। इनमें इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी प्रमुख सरकारी कंपनियां शामिल हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के उपभोक्ताओं को गैस सिलेंडर की सप्लाई में किसी तरह की बाधा न आए।

हालांकि भारत के लिए एक राहत की खबर भी सामने आई है। भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने की शर्तों के साथ छूट मिल गई है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन का विशेष लाइसेंस जारी किया है, जो 3 अप्रैल तक वैध रहेगा। इससे भारत फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी से बच सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव अब केवल क्षेत्रीय संकट नहीं रहा, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ने लगा है।

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