अक्सर जब किसी से पूछा जाता है कि वह फिट है या नहीं, तो ज्यादातर लोग अपने वजन को ही इसका पैमाना मान लेते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ वजन से यह तय नहीं होता कि व्यक्ति वास्तव में कितना स्वस्थ है। असली फिटनेस इस बात से तय होती है कि शरीर में मांसपेशियों और फैट का अनुपात यानी मसल-फैट रेशियो कितना संतुलित है। यदि शरीर में मसल्स ज्यादा और फैट कम है तो न सिर्फ शरीर मजबूत रहता है बल्कि दिमाग भी ज्यादा सक्रिय और स्वस्थ बना रहता है।
हाल ही में ‘जर्नल ऑफ अल्जाइमर्स एसोसिएशन’ में प्रकाशित एक अध्ययन में यह सामने आया है कि शरीर का मसल-फैट रेशियो ब्रेन हेल्थ का महत्वपूर्ण संकेतक हो सकता है। रिसर्च के अनुसार जिन लोगों के शरीर में मांसपेशियों का प्रतिशत ज्यादा होता है और चर्बी कम होती है, उनका दिमाग बेहतर तरीके से काम करता है। वहीं जिन लोगों के शरीर में फैट अधिक होता है, उनमें उम्र के साथ ब्रेन एजिंग और कॉग्निटिव क्षमता में गिरावट का खतरा बढ़ सकता है।
दरअसल हमारा शरीर मुख्य रूप से दो प्रमुख हिस्सों से मिलकर बना होता है—मसल्स और फैट। शरीर में इन दोनों के बीच का संतुलन ही मसल-फैट रेशियो कहलाता है। यह रेशियो शरीर की बनावट, ताकत और मेटाबॉलिक हेल्थ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देता है। जब शरीर में मसल्स ज्यादा और फैट कम होता है तो शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहतर तरीके से काम करता है और कई बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है।
डॉक्टरों के अनुसार मसल्स और ब्रेन के बीच एक गहरा संबंध होता है। आमतौर पर हम यह मानते हैं कि ब्रेन शरीर की मांसपेशियों को नियंत्रित करता है और उन्हें काम करने के लिए सिग्नल भेजता है। यह बात सही है, लेकिन दूसरी ओर मसल्स भी ब्रेन को महत्वपूर्ण संकेत भेजती हैं। उदाहरण के लिए जब हम व्यायाम करते हैं तो मांसपेशियां मायोकाइन्स नाम के कुछ खास केमिकल्स रिलीज करती हैं। ये केमिकल्स ब्रेन सेल्स को मजबूत बनाने में मदद करते हैं और दिमाग की कार्यक्षमता को बेहतर बनाते हैं। इससे याददाश्त में सुधार होता है और उम्र बढ़ने के साथ दिमाग की क्षमता में गिरावट का खतरा भी कम हो जाता है।
रिसर्च में यह भी पाया गया है कि शरीर में चर्बी ज्यादा होने से ब्रेन एजिंग की प्रक्रिया तेज हो सकती है। खासतौर पर पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी यानी विसरल फैट शरीर में सूजन की स्थिति पैदा कर सकती है। यह सूजन धीरे-धीरे दिमाग तक असर डाल सकती है और लंबे समय में याददाश्त कमजोर होने, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत और कॉग्निटिव डिक्लाइन जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
मसल-फैट रेशियो की तुलना अक्सर बॉडी मास इंडेक्स यानी BMI से की जाती है, लेकिन दोनों में बड़ा अंतर है। BMI केवल व्यक्ति के वजन और लंबाई के आधार पर यह बताता है कि कोई व्यक्ति अंडरवेट, सामान्य वजन, ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में है। लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि शरीर में वजन का कारण मसल्स हैं या फैट। वहीं मसल-फैट रेशियो शरीर की वास्तविक बनावट यानी बॉडी कंपोजिशन को दर्शाता है और इस लिहाज से यह ज्यादा सटीक संकेतक माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि शरीर में मसल-फैट रेशियो संतुलित रहता है तो इसका सकारात्मक असर पूरे शरीर पर पड़ता है। इससे हार्मोन संतुलित रहते हैं और स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल भी नियंत्रण में रहता है। बेहतर मसल-फैट संतुलन से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन भी अच्छा रहता है, जिससे दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचते हैं। इसके अलावा शरीर में सूजन कम होती है और मेमोरी लॉस तथा ब्रेन एजिंग का खतरा भी घट जाता है।
इसके विपरीत अगर शरीर में फैट ज्यादा और मसल्स कम हो जाएं तो कई तरह की समस्याएं सामने आ सकती हैं। ज्यादा फैट शरीर में लो-ग्रेड इंफ्लेमेशन पैदा करता है जो धीरे-धीरे दिमाग पर भी असर डाल सकता है। वहीं मसल्स कम होने से इंसुलिन सेंसिटिविटी घट जाती है, जिससे ब्लड शुगर का स्तर असंतुलित हो सकता है। लंबे समय में यह स्थिति दिमाग की कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
मसल्स कम होने के पीछे केवल उम्र ही जिम्मेदार नहीं होती। खराब जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों की कमी, हार्मोनल बदलाव, कुछ बीमारियां और दवाओं के साइड इफेक्ट भी मसल लॉस का कारण बन सकते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और नियमित व्यायाम करने की सलाह देते हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि मजबूत मांसपेशियां ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाए रखने में मदद करती हैं। हालांकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि मसल्स बढ़ाने से ब्रेन एजिंग पूरी तरह रुक जाती है, लेकिन सक्रिय और मजबूत मसल्स दिमाग की कार्यक्षमता को जरूर सपोर्ट करती हैं। मसल्स से निकलने वाले मायोकाइन्स जैसे केमिकल्स शरीर में सूजन कम करने और ब्रेन सेल्स के बीच बेहतर कनेक्शन बनाने में मदद कर सकते हैं।
खान-पान भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब हम प्रोटीन युक्त भोजन करते हैं तो शरीर उसे अमीनो एसिड में तोड़ देता है। यही अमीनो एसिड दिमाग में न्यूरोट्रांसमीटर बनाने में मदद करते हैं। ये केमिकल्स ब्रेन सेल्स के बीच संदेश पहुंचाने का काम करते हैं। इसके कारण दिमाग की कार्यक्षमता बेहतर होती है, मूड स्थिर रहता है, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है और ब्रेन सेल्स की मरम्मत की प्रक्रिया भी बेहतर होती है।
शरीर में फैट ज्यादा है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए कई तरह के टेस्ट किए जाते हैं। इनमें बॉडी फैट परसेंटेज मापना सबसे सटीक तरीका माना जाता है। इसके लिए DEXA स्कैन, BIA मशीन और स्किनफोल्ड टेस्ट जैसे तरीकों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा पेट के आसपास ज्यादा चर्बी होना या कमर का माप ज्यादा होना भी हाई फैट रेशियो का संकेत हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति की कमर उसकी लंबाई के आधे से ज्यादा है तो इसे भी जोखिम का संकेत माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार मसल-फैट रेशियो को संतुलित बनाए रखने के लिए संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली बेहद जरूरी है। भोजन में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, हेल्दी फैट, पर्याप्त फाइबर और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट शामिल होने चाहिए। इसके साथ ही नियमित व्यायाम करना, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करना और लंबे समय तक बैठे रहने से बचना जरूरी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और ज्यादा शुगर वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना चाहिए। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, शुगरी ड्रिंक्स और पैकेज्ड फूड से दूरी बनाए रखना भी जरूरी है। इसके अलावा धूम्रपान और शराब से बचना, रोजाना लगभग आठ घंटे की अच्छी नींद लेना, स्क्रीन टाइम कम करना और तनाव को नियंत्रित रखना भी शरीर और दिमाग दोनों के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है।
कुल मिलाकर यह साफ है कि फिटनेस केवल वजन कम करने से नहीं आती, बल्कि शरीर में मसल्स और फैट के सही संतुलन से आती है। यदि मसल-फैट रेशियो संतुलित रखा जाए तो न केवल शरीर मजबूत रहता है बल्कि दिमाग भी लंबे समय तक सक्रिय और स्वस्थ बना रहता है।