जर्मनी की ऑटो इंडस्ट्री पर संकट के बादल, ईवी बदलाव और वैश्विक दबाव से कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती

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यूरोप की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने वाले जर्मनी की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री इन दिनों गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। खासकर दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी का औद्योगिक राज्य Baden‑Württemberg लंबे समय से देश के औद्योगिक मॉडल का प्रतीक माना जाता रहा है, जहां छोटी, मध्यम और बड़ी कंपनियां उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद, विशेष रूप से कारों का निर्माण करती रही हैं। लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात और तकनीकी परिवर्तन इस पूरे ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं।

दरअसल अमेरिकी टैरिफ, चीन से बढ़ते आयात और ऑटोमोबाइल सेक्टर में आ रही मंदी के कारण जर्मनी की पारंपरिक कार इंडस्ट्री दबाव में आ गई है। सबसे बड़ा बदलाव इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेजी से बढ़ता रुझान है, जिसके कारण पेट्रोल, डीजल और गैस से चलने वाली छोटी कारों के बाजार में गिरावट की आशंका बढ़ गई है।

राज्य के आर्थिक मामलों की मंत्री Nicole Hoffmeister‑Kraut के मुताबिक ऑटो सेक्टर अपने इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। राज्य की राजधानी Stuttgart के आसपास करीब दो लाख नौकरियां सीधे तौर पर इस उद्योग पर निर्भर हैं, इसलिए उद्योग में आई सुस्ती का असर रोजगार पर भी दिखाई देने लगा है।

दिग्गज ऑटो कंपनियां भी इस संकट से अछूती नहीं हैं। लग्जरी कार निर्माता Mercedes‑Benz और Porsche पहले ही कर्मचारियों की संख्या घटाने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं। वहीं ऑटो पार्ट्स की बड़ी सप्लायर कंपनी Bosch ने वर्ष 2030 तक लगभग 22 हजार नौकरियां कम करने की योजना बनाई है।

सबसे ज्यादा दबाव उन छोटी और मध्यम कंपनियों पर है जो पारंपरिक कम्बशन इंजन यानी पेट्रोल, डीजल और गैस से चलने वाली कारों के पुर्जे बनाती हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग के कारण इन कंपनियों के उत्पादों की मांग घटने का खतरा बढ़ गया है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि पहले जहां कंपनियां कर्मचारियों की संख्या कम कर रही थीं, अब कई कंपनियां पूरी तरह बंद होने की स्थिति में पहुंच रही हैं।

ऑटो सेक्टर में आई सुस्ती का असर सरकार की आय पर भी पड़ा है। पिछले दो वर्षों में कॉरपोरेट टैक्स से मिलने वाली आय में लगभग आधी गिरावट दर्ज की गई है। यही कारण है कि कई कंपनियां अब नए क्षेत्रों में संभावनाएं तलाशने लगी हैं।

उदाहरण के तौर पर लगभग पांच हजार कर्मचारियों वाली कूलिंग टेक्नोलॉजी कंपनी ebm‑papst ने पांच साल पहले ही बदलते हालात को देखते हुए ऑटोमोबाइल सेक्टर से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। कंपनी ने अपना ध्यान डेटा सेंटरों के कूलिंग सिस्टम के विकास पर केंद्रित कर दिया है, जो अब तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र माना जा रहा है।

हालांकि कई विशेषज्ञ अब भी मानते हैं कि जर्मनी का ऑटो सेक्टर पूरी तरह खत्म नहीं होने वाला, बल्कि इसमें बदलाव आएगा। सत्तारूढ़ ग्रीन पार्टी के नेता Cem Özdemir का कहना है कि जर्मनी को भविष्य की कारों के निर्माण में अग्रणी बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

बादेन-वुर्टेमबर्ग राज्य की एक बड़ी ताकत उसकी कुशल कार्यबल और मजबूत शोध ढांचा भी है। यहां उत्कृष्ट विश्वविद्यालय, रिसर्च संस्थान और इनोवेशन का माहौल मौजूद है। जर्मनी की कुल आबादी का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा इसी राज्य में रहता है, लेकिन देश के लगभग 40 प्रतिशत पेटेंट आवेदन यहीं से आते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में भी यहां तेजी से विकास हो रहा है।

इन सबके बीच विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी की कार इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। आने वाले वर्षों में यह साफ होगा कि पारंपरिक इंजन वाली कारों से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ते इस परिवर्तन में कंपनियां खुद को कितनी तेजी से ढाल पाती हैं।

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