पश्चिम एशिया में भड़कते संघर्ष के बीच अब कूटनीति का एक बड़ा खेल सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान के सामने 15 सूत्रीय युद्धविराम प्रस्ताव रखकर संकेत दे दिया है कि अमेरिका एक तरफ दबाव की नीति जारी रखेगा, तो दूसरी तरफ बातचीत के जरिए समाधान भी तलाशेगा। इस प्रस्ताव को ट्रंप के करीबी सहयोगी जेरेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने तैयार किया है, जिसे पाकिस्तान के जरिए तेहरान तक पहुंचाया गया है।
इस प्रस्ताव की खास बात यह है कि इसमें शांति के बदले बेहद सख्त और व्यापक शर्तें रखी गई हैं। सबसे बड़ी मांग यह है कि ईरान अपनी पूरी परमाणु क्षमता को खत्म करे और भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार विकसित न करने की गारंटी दे। साथ ही यूरेनियम संवर्धन पर पूरी तरह रोक लगाने और अपने संवर्धित भंडार को अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के हवाले करने जैसी शर्तें भी शामिल हैं। नतांज, इस्फ़हान और फोर्डो जैसे प्रमुख परमाणु केंद्रों को बंद या नष्ट करने की मांग इस प्रस्ताव को और भी कठोर बनाती है।
सिर्फ परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय रणनीति पर भी अमेरिका ने ईरान को घेरने की कोशिश की है। प्रस्ताव में साफ कहा गया है कि ईरान को मध्य पूर्व में अपने प्रॉक्सी नेटवर्क—जैसे हिजबुल्लाह और हमास—की गतिविधियां पूरी तरह बंद करनी होंगी और किसी भी मिलिशिया को वित्तीय या सैन्य मदद नहीं देनी होगी। इसके अलावा मिसाइल कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की स्थायी व्यवस्था और वैश्विक शिपिंग के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना शर्त खुला रखने जैसी शर्तें भी रखी गई हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जहां एक ओर अमेरिका बातचीत की पहल कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सैन्य दबाव भी लगातार बढ़ाया जा रहा है। पेंटागन ने अपनी ‘82nd एयरबोर्न डिवीजन’ के करीब 1,000 अतिरिक्त सैनिकों को मध्य पूर्व भेजने की तैयारी कर ली है। इसके साथ ही हजारों मरीन और नाविकों की तैनाती भी की जा रही है, जिससे साफ है कि अमेरिका “डिप्लोमेसी और डिटरेंस” दोनों रणनीतियों पर एक साथ काम कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका भी बेहद अहम बन गई है। इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में उभर रहा है और उसने दोनों देशों के बीच नई वार्ता की मेजबानी की पेशकश भी की है। यह कूटनीतिक संतुलन का एक नया आयाम खोलता है, जहां पाकिस्तान खुद को एक महत्वपूर्ण संवादकर्ता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, इस प्रस्ताव ने इजरायल को भी असहज कर दिया है। तेल अवीव को उम्मीद थी कि अमेरिका सैन्य दबाव बनाए रखेगा, लेकिन अचानक सामने आए इस “फ्रेमवर्क एग्रीमेंट” ने रणनीतिक समीकरणों को थोड़ा बदल दिया है।
कुल मिलाकर, यह 15 सूत्रीय प्रस्ताव केवल युद्धविराम का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक दबाव है—जिसमें ईरान के परमाणु, सैन्य और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने की कोशिश साफ दिखाई देती है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तेहरान इन कड़ी शर्तों को स्वीकार करेगा, या फिर यह प्रस्ताव भी तनाव को और बढ़ाने का कारण बनेगा।