धरसींवा के कुंवरगढ़ में आयोजित ‘कुंवरगढ़ महोत्सव’ ने इस बार सच में इतिहास रच दिया है। विधायक Anuj Sharma की पहल पर शुरू हुए इस आयोजन का दूसरा दिन संस्कृति, कला और जनउत्साह का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल रहा, जहां हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने देर रात तक कार्यक्रम का आनंद लिया।
इस भव्य आयोजन में छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री Tankaram Verma और कौशल विकास मंत्री Guru Khushwant Saheb की मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया। मंच से दिए गए उनके संबोधन में क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और उसे नई पहचान देने की बात प्रमुख रूप से सामने आई।
महोत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण प्रदेश के चर्चित कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियां रहीं। Vivek Sharma, Garima Diwakar, Pappu Chandrakar और Champa Nishad ने अपनी गायकी और लोक-सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से ऐसा माहौल बनाया कि दर्शक देर रात तक झूमते रहे। हर प्रस्तुति पर तालियों की गूंज ने पूरे पंडाल को जीवंत कर दिया।
इसके साथ ही नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र से आए मलखंब कलाकारों ने अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन किया। ऊंचाई पर संतुलन और जोखिम भरे स्टंट्स ने दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। वहीं अंतरराष्ट्रीय पोल आर्टिस्टों की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को एक अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया, जहां हर मूवमेंट पर लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाईं।
मंत्री टंकराम वर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि कुंवरगढ़ की पहचान सिर्फ इसके किले या इतिहास से नहीं, बल्कि यहां की माटी, परंपरा और शौर्य से है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। इतना ही नहीं, दर्शकों के आग्रह पर उन्होंने “मोर गंवई ये गंगा रे” गीत गाकर माहौल को और भी भावुक बना दिया।
वहीं गुरु खुशवंत साहेब ने इसे सांस्कृतिक जागरण की दिशा में एक बड़ी पहल बताते हुए कहा कि कुंवरगढ़ का गौरव यहां के लोगों के दिलों में बसता है। उन्होंने सरकार की ओर से क्षेत्र के ऐतिहासिक स्थलों और पर्यटन विकास के लिए हर संभव सहयोग देने का भरोसा दिलाया।
कार्यक्रम के अंत में विधायक अनुज शर्मा ने सभी अतिथियों और जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह महोत्सव किसी सरकार का नहीं, बल्कि कुंवरगढ़ की जनता का उत्सव है। उन्होंने इस आयोजन को हर साल और भी भव्य बनाने का संकल्प लिया और शहर को सांस्कृतिक रूप से मजबूत पहचान दिलाने की बात कही।
कुल मिलाकर, कुंवरगढ़ महोत्सव का यह दिन सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और जनभागीदारी का ऐसा संगम बन गया, जिसने पूरे क्षेत्र को गर्व से भर दिया।