पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी को लेकर फैल रही खबरों पर केंद्र सरकार ने साफ शब्दों में विराम लगा दिया है। 23 अप्रैल को पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि फिलहाल ईंधन के दाम बढ़ाने का कोई प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है। मंत्रालय ने ऐसी खबरों को भ्रामक बताते हुए कहा कि इन्हें अनावश्यक डर फैलाने के लिए प्रचारित किया जा रहा है।
दरअसल, एक दिन पहले कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया था कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव खत्म होने के बाद पेट्रोल और डीजल के दाम ₹25 से ₹28 प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। यह अनुमान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की संभावना के आधार पर जताया गया था, जिसने आम लोगों में चिंता बढ़ा दी थी।
हालांकि, सरकार ने इन अटकलों को खारिज करते हुए यह भी रेखांकित किया कि भारत उन चुनिंदा बड़े देशों में शामिल है, जहां पिछले चार वर्षों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में स्थिरता बनी हुई है, जबकि वैश्विक बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह भी है कि तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियों को हर महीने करीब 27,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। कच्चे तेल की महंगी खरीद और नियंत्रित घरेलू कीमतों के बीच बढ़ते अंतर ने कंपनियों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण बना दी है।
वैश्विक स्तर पर हालात भी ईंधन कीमतों पर असर डाल रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की सप्लाई को प्रभावित किया है। खासकर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे अहम तेल मार्ग में बाधा आने से सप्लाई घट गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी देखी जा रही है। भारत का कच्चे तेल का आयात भले 13-15% तक घटा हो, लेकिन बढ़ी हुई कीमतों के कारण आयात बिल में रोजाना 1800 से 2000 करोड़ रुपए तक का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
अगर भविष्य में कीमतों में बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा। माल ढुलाई महंगी होने से रोजमर्रा की चीजों—जैसे फल, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुएं—भी महंगी हो सकती हैं। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा और ऑटोमोबाइल सेक्टर से लेकर ग्रामीण बाजार तक इसकी मार महसूस की जा सकती है।
फिलहाल सरकार ने साफ कर दिया है कि कीमत बढ़ाने का कोई फैसला नहीं लिया गया है, जिससे आम लोगों को राहत मिली है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को देखते हुए आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।