बिलासपुर – बिलासपुर में पलायन फिर एक बड़ी समस्या बनकर सामने आने लगी है। खास तौर पर मस्तूरी और बिल्हा ब्लाक के गांव खाली होने लगे हैं। मस्तूरी में पच्रपेड़ी, केंवटाडीह, मचहा, खोन्द्रा से लेकर जोन्धरा तक तो तखतपुर के अधिकांश गांवों से लोग पलायन कर रहे हैं। बिल्हा ब्लॉक की भी यही हालत है। अधिकांश वाहनों में लोग खुलेआम लोग जा रहे हैं। बिल्हा के चोरहादेवरी और दूसरे गांव की भी यही हालत है।
घरों में ताले, रोजगार की तलाश में बाहर
पचपेड़ी और चोरहादेवरी के अधिकांश घरों में ताला लगा है। कुछ घरों में दरवाजे की ईंटो से चुनाई कर दी गई है तो कई लोगों ने कांटों को दरवाजे पर रख दिया है। जिले के ब्लाकों में खास तौर पर मस्तूरी ब्लॉक में रोजगार की कमी के कारण बड़े पैमाने पर पलायन एक गंभीर समस्या है, जिसमें ग्रामीण बेहतर मजदूरी की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं। आंकड़ों के अनुसार, यह क्षेत्र पलायन में सबसे आगे रहा है और बड़ी संख्या में श्रमिक बाहर जा चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप कई घरों में ताले लटक रहे हैं। हालांकि श्रम विभाग इसे पलायन नहीं बल्कि बेहतर रोजगार की तलाश में जाना मानता है।
तीन साल में 30 हजार गए दूसरे प्रदेश
इधर, सरकारी दावा है कि छत्तीसगढ़ मनरेगा में काम देने के मामले में देश में नौवें स्थान पर है। वर्ष 2024-25 में राज्य ने 13.23 करोड़ मानव दिवस रोजगार सृजित किया। श्रम विभाग के मुताबिक जिले में 2023-24 में 8983, 2024-25 में 9052 और 2025-26 में 11868 लोगों ने पलायन किया है। सबसे बड़ी बात कि दावा किया जाता है कि बिलासपुर जिले ने मनरेगा में काम देने में प्रदेश में पहला स्थान पाया है। इसके बावजूद सबसे ज्यादा मजदूर यहीं से फ्लायन करते हैं और मस्तूरी ब्लॉक हमेशा से इस समस्या का हॉट स्पॉट रहा है। मस्तूरी में मजदूर उत्तरप्रदेश, गुजरात के ईंट भट्ठों या दिल्ली-मुंबई काम की तलाश में चले गए हैं।
यह है गांवों की स्थिति
मचहा गांव के देवेन्द्र पटेल बताते हैं कि गांव की जनसंख्या 2700 के करीब है इसमें से 900 से अधिक लोग घलायन कर चुके हैं। पचपेड़ी गांव के रामेश्वर जायसवाल बताते हैं कि 7 हजार की जनसंख्या वाले गांव में” 1700 से अधिक लोग दूसरे प्रदेश चले गए हैं। इसी तरह सेमरताल के 40 से अधिक परिवार बाहर जा चुके हैं तो रलिया गांव से पलायन करने वाले परिवारों की संख्या 30 से अधिक है। *रांक गाव के लोग भी स्थानीय स्तर पर काम नहीं होने के कारण मजदूरी के लिए बाहर निकल गए हैं। इन गांव में से अधिकांश लोग गुजरात, उत्तरप्रदेश और जम्मू गए हैं।
केंवटाडीह से सूरत तक का सफर
केंवटाडीह में जो लोग बाहर जा रहे उनकी पंचायतों में एंट्री तक नहीं हो रही। जांजगीर-चांपा सीमा से लगे इस गांव में 55-60% लोग हर साल पलायन करते हैं। पचपेड़ी इलाके के जलसो गांव में आधे से ज्यादा लोग बाहर जा चुके हैं। यहां मनरेगा में काम नहीं मिला। गांव की 70% आबादी आदिवासी है। इसी तरह भरारी गांव में अनुसूचित जाति वर्ग के मोहल्ले में ज्यादातर घर बंद हैं। यहां के लोग सूरत और ढोलका जा चुके हैं।