छत्तीसगढ़ में शिक्षा के अधिकार यानी RTE के तहत गरीब बच्चों के एडमिशन को लेकर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश के सैकड़ों स्कूलों में एक भी आवेदन नहीं आने की जानकारी सामने आने के बाद कोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। खास बात यह है कि जिन 387 स्कूलों में एक भी आवेदन नहीं आया, उनमें कई बड़े और नामी निजी स्कूल भी शामिल बताए जा रहे हैं।
इस मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार से तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि क्या गरीब बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ना नहीं चाहते या फिर सरकार कहीं कुछ छिपाने की कोशिश कर रही है। अदालत ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए शिक्षा सचिव को 10 जुलाई तक शपथ पत्र के साथ विस्तृत जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं।
दरअसल, यह मामला शिक्षा के अधिकार कानून के तहत दाखिले को लेकर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र पेश किया, जिसमें बताया गया कि प्रदेश के 387 स्कूलों में पहली कक्षा में प्रवेश के लिए एक भी आवेदन प्राप्त नहीं हुआ। इसके अलावा 366 ऐसे स्कूल भी हैं जहां उपलब्ध सीटों की तुलना में आवेदन बेहद कम आए हैं।
सरकार की यह जानकारी सुनते ही हाईकोर्ट ने हैरानी जताई और कहा कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। अदालत ने पूछा कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि बड़े निजी स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए आरक्षित सीटों पर आवेदन ही न आएं। कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि क्या प्रवेश प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त जानकारी लोगों तक पहुंचाई ही नहीं गई।
डिवीजन बेंच ने राज्य शासन को निर्देश दिया है कि RTE के तहत उपलब्ध सीटों और दाखिले की पूरी जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए। अदालत ने कहा कि सरकार को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि किस स्कूल में कितनी सीटें आरक्षित थीं, कितने आवेदन आए और किन बच्चों को प्रवेश दिया गया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने पूछा कि जब नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है तो गरीब बच्चों का एडमिशन आखिर कब होगा। अदालत ने चिंता जताई कि अगर इसी तरह देरी और लापरवाही जारी रही तो हजारों बच्चों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
हाईकोर्ट ने उन मामलों पर भी सवाल उठाए जहां बड़े स्कूलों में सिर्फ एक या दो बच्चों के एडमिशन की जानकारी दी गई है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर किसी स्कूल में केवल एक बच्चे को प्रवेश मिला है तो क्या वहां कुल चार बच्चे ही पढ़ते हैं। जबकि RTE कानून के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है।
कोर्ट की टिप्पणियों के बाद अब राज्य सरकार पर जवाब देने का दबाव बढ़ गया है। माना जा रहा है कि आने वाली सुनवाई में सरकार को पूरी प्रवेश प्रक्रिया और सीट आवंटन का विस्तृत ब्यौरा पेश करना पड़ेगा।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि RTE कानून का उद्देश्य गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को बड़े निजी स्कूलों में पढ़ने का अवसर देना है। लेकिन अगर सैकड़ों स्कूलों में आवेदन ही नहीं पहुंच रहे हैं, तो इससे पूरी व्यवस्था और जागरूकता अभियान पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब सबकी नजर 10 जुलाई की अगली सुनवाई पर टिकी हुई है, जब राज्य सरकार को हाईकोर्ट के सामने पूरी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।