पूरा विवाद राजभवन के उस फैसले से शुरू हुआ, जिसमें तमिलनाडु के राज्यपाल आर.वी. अर्लेकर ने टीवीके प्रमुख विजय को सरकार बनाने का न्योता देने से इनकार कर दिया। राज्यपाल ने कहा कि सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है और फिलहाल टीवीके के पास यह संख्या नहीं है।
टीवीके के पास अपने 108 विधायकों के अलावा कांग्रेस के 5 विधायकों का समर्थन बताया जा रहा है, जिससे कुल संख्या 113 तक पहुंचती है। यानी बहुमत से अभी भी 5 विधायक कम हैं। राज्यपाल के इस रुख के बाद टीवीके अब कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है और मामले को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रही है।
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी जोरदार चर्चा है कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम विजय को सत्ता से दूर रखने के लिए किसी “वैकल्पिक व्यवस्था” पर काम कर सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक डीएमके बाहरी समर्थन देकर एआईएडीएमके नेता ई. पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के विकल्प पर विचार कर सकती है। हालांकि दोनों दलों की ओर से अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी औपचारिक सहमति की पुष्टि नहीं की गई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एम.के. स्टालिन की भूमिका भी काफी अहम मानी जा रही है। डीएमके की बैठक में उन्हें किसी भी आपातकालीन राजनीतिक स्थिति में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले 48 घंटे तमिलनाडु की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
विपक्षी दलों ने भी राज्यपाल के फैसले पर सवाल उठाए हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा है कि सबसे बड़ी पार्टी को पहले बहुमत साबित करने का मौका मिलना चाहिए। वहीं थोल थिरुमावलवन और कमल हासन की पार्टी ने भी टीवीके को नैतिक समर्थन दिया है।
टीवीके की सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। अगर 108 विधायक एक साथ इस्तीफा देते हैं, तो विधानसभा का पूरा गणित बदल सकता है और राज्य में दोबारा चुनाव या राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति भी बन सकती है।
फिलहाल चेन्नई में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और प्रमुख राजनीतिक दलों के दफ्तरों के बाहर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। तमिलनाडु की राजनीति अब पूरी तरह राजभवन, अदालत और दलों के अगले कदम पर टिकी हुई है।