भारत सरकार ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने और भारतीय वित्तीय बाजारों को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर मिलने वाले कई करों से राहत देने का फैसला किया है। इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ाना, रुपये को मजबूती देना और वैश्विक निवेशकों के लिए भारत को अधिक आकर्षक निवेश गंतव्य बनाना है।
सरकार द्वारा जारी नए प्रावधानों के अनुसार विदेशी संस्थागत निवेशकों को अब सरकारी बॉन्ड्स पर मिलने वाले दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (Long Term Capital Gain) पर कर नहीं देना होगा। इसके साथ ही सरकारी प्रतिभूतियों से अर्जित ब्याज आय पर लगने वाला कर भी पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। यह व्यवस्था 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानी जाएगी।
अब तक विदेशी निवेशकों को सूचीबद्ध बॉन्ड्स और अन्य प्रतिभूतियों में एक वर्ष से अधिक अवधि तक निवेश बनाए रखने पर 12.5 प्रतिशत दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर देना पड़ता था। वहीं सरकारी बॉन्ड्स से अर्जित ब्याज आय पर 20 प्रतिशत तक विदहोल्डिंग टैक्स भी लागू था। सरकार के नए फैसले से विदेशी निवेशकों को सीधा कर लाभ मिलेगा और उनकी वास्तविक निवेश आय बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी हुई है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और विदेशी पूंजी की निकासी जैसी चुनौतियों के कारण भारतीय रुपये पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में सरकार विदेशी निवेशकों को अतिरिक्त प्रोत्साहन देकर देश में डॉलर निवेश बढ़ाना चाहती है।
सरकारी राजपत्र में जारी अधिसूचना के अनुसार सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री, हस्तांतरण या विनिमय से होने वाले पूंजीगत लाभ पर भी कोई कर नहीं लगेगा। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय सरकारी बॉन्ड्स अन्य उभरते बाजारों की तुलना में अधिक आकर्षक बन सकते हैं।
इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) का दायरा और विस्तारित किया जाएगा। इसके तहत अब 15 वर्ष, 30 वर्ष और 40 वर्ष की अवधि वाले नए सरकारी बॉन्ड्स भी विदेशी निवेशकों के लिए उपलब्ध होंगे। इससे लंबी अवधि के निवेश की तलाश कर रहे वैश्विक फंड्स को भारत में अधिक अवसर मिल सकेंगे।
सरकार ने अनिवासी भारतीयों (NRI) और भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों (OCI) के लिए भी निवेश संबंधी नियमों को सरल बनाने की दिशा में कदम उठाया है। प्रस्ताव है कि बिना सेबी पंजीकरण के इक्विटी निवेश की सीमा बढ़ाई जाए, जिससे विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए भारतीय बाजारों में निवेश करना और आसान हो सके।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इन फैसलों से भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी भागीदारी बढ़ सकती है। इससे सरकार की उधारी लागत कम होने, वित्तीय बाजारों में तरलता बढ़ने और रुपये को स्थिरता मिलने की संभावना है। साथ ही भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए एक भरोसेमंद और आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करने में भी मदद मिलेगी।
हालांकि इन कदमों का वास्तविक प्रभाव आने वाले महीनों में विदेशी निवेश के आंकड़ों से स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल सरकार और RBI दोनों का फोकस विदेशी पूंजी आकर्षित करने और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने पर है। यदि विदेशी निवेश में अपेक्षित वृद्धि होती है तो इसका सकारात्मक असर रुपये, बॉन्ड बाजार और समग्र अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।