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सप्त ऋषियों की तपोभूमि सिहावा का रहस्य : यहां अस्थियां कुछ घंटों में हो जाती हैं विलीन, श्रद्धालु मानते हैं मोक्ष का द्वार

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नगरी। सिहावा अंचल की रहस्यमयी और पावन धरती, जहां इतिहास, आस्था और प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। महानदी के उद्गम स्थल, सप्त ऋषियों की तपोभूमि और कर्णेश्वर धाम की पावन छाया से घिरा यह क्षेत्र अपने धार्मिक महत्व के साथ-साथ एक अनसुलझे रहस्य के लिए भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहां पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन करने के बाद वे कुछ ही घंटों में जल में पूरी तरह विलीन हो जाती हैं। श्रद्धालु इसे दिव्य कृपा और मोक्ष का प्रतीक मानते हैं, जबकि यह रहस्य आज भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बना हुआ है।

महानदी उद्गम और आस्था का केंद्र
सिहावा अंचल को महानदी का उद्गम स्थल माना जाता है। महेंद्रगिरी पर्वत से निकलने वाली महानदी इस क्षेत्र की धार्मिक पहचान का प्रमुख आधार है। कर्णेश्वर धाम, त्रिवेणी संगम और आसपास स्थित धार्मिक स्थलों के कारण यह क्षेत्र सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। यहां आने वाले भक्त केवल दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए ही नहीं, बल्कि अपने पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान करने भी पहुंचते हैं।

अस्थि विसर्जन से जुड़ा अनोखा रहस्य
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सिहावा स्थित त्रिवेणी संगम में अस्थि विसर्जन के बाद कुछ ही घंटों में अस्थियां जल में पूरी तरह समा जाती हैं। कर्णेश्वर धाम ट्रस्ट अध्यक्ष विकल गुप्ता, भरत निर्मलकार तथा स्थानीय पिंडा पुजारी कैलाश तिवारी सहित क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यह स्थान पितरों की मुक्ति और आत्मिक शांति प्रदान करने वाला तीर्थ माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मां गंगा और महानदी की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अमृत कुंड में विधि-विधान से होते हैं संस्कार
सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों से लोग अपने पूर्वजों की अस्थियां लेकर सिहावा पहुंचते हैं। महानदी उद्गम स्थल से लगभग 500 मीटर दूर स्थित त्रिवेणी संगम में कर्णेश्वर मंदिर के समीप अमृत कुंड के पास विधि-विधान से पिंडदान, तर्पण और पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद श्रद्धालु अस्थियों का विसर्जन करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस अनूठी प्रक्रिया को देखने के बाद श्रद्धालुओं की आस्था और अधिक प्रगाढ़ हो जाती है।

सप्त ऋषियों की तपोभूमि से जुड़ी हैं प्राचीन कथाएं
सिहावा का महत्व केवल अस्थि विसर्जन तक सीमित नहीं है। पुराणों और लोककथाओं में इसे सप्त ऋषियों की तपोभूमि बताया गया है। माना जाता है कि प्राचीन काल में कई ऋषि-मुनियों ने यहां कठोर तपस्या की थी, जिसके कारण यह क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। क्षेत्र की धार्मिक परंपराएं, प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व इसे छत्तीसगढ़ के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल करते हैं।

हर वर्ष पहुंचते हैं हजारों श्रद्धालु
आस्था और रहस्य के इस अद्भुत संगम को देखने के लिए हर वर्ष हजारों श्रद्धालु, पर्यटक और जिज्ञासु सिहावा पहुंचते हैं। यहां आने वाले लोगों के लिए यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति और लोकविश्वास को समझने का अवसर भी होता है। सिहावा आज भी अपने अनसुलझे रहस्य, धार्मिक मान्यताओं और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण लोगों की श्रद्धा और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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