हम अक्सर सेहत की बात करते वक्त कैल्शियम और आयरन तक ही रुक जाते हैं, लेकिन पोटैशियम एक ऐसा मिनरल है जिसकी कमी चुपचाप शरीर को कमजोर कर देती है। शुरुआत में यह थकान, हल्की कमजोरी या मांसपेशियों में खिंचाव के रूप में दिखता है, लेकिन समय के साथ यही कमी दिल, किडनी और पाचन तंत्र तक को प्रभावित करने लगती है। बदलती लाइफस्टाइल, जंक फूड पर बढ़ती निर्भरता और फल-सब्जियों की कमी के चलते आज बड़ी संख्या में लोग इस समस्या की चपेट में आ रहे हैं।
पोटैशियम शरीर के लिए एक जरूरी इलेक्ट्रोलाइट है, जो नसों और मांसपेशियों के बीच तालमेल बनाए रखता है। यह दिल की धड़कन को नियमित रखने, ब्लड प्रेशर को संतुलित करने और शरीर में फ्लूइड बैलेंस बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। जब शरीर में इसकी मात्रा घटने लगती है, तो सबसे पहले असर हार्ट रिदम पर पड़ता है और लंबे समय तक कमी बनी रहे तो हाई ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन, बिना मेहनत के कमजोरी महसूस होना या चलते-फिरते पैरों में खिंचाव भी पोटैशियम की कमी का संकेत हो सकता है। इतना ही नहीं, यह कमी पाचन तंत्र को भी सुस्त बना देती है, जिससे कब्ज, गैस और पेट फूलने जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। शरीर की कोशिकाओं को पर्याप्त ऊर्जा न मिलने के कारण व्यक्ति जल्दी थक जाता है, चक्कर आने लगते हैं और काम में मन नहीं लगता। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो किडनी के कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
अच्छी बात यह है कि पोटैशियम की कमी को महंगी दवाओं से पहले सही खानपान से काफी हद तक संभाला जा सकता है। केला, हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक और मेथी, नारियल पानी, शकरकंद और दालें-बीन्स जैसे राजमा व चना रोजमर्रा की डाइट में शामिल करके शरीर का पोटैशियम लेवल संतुलित रखा जा सकता है। ये खाद्य पदार्थ न सिर्फ मिनरल की कमी पूरी करते हैं, बल्कि ओवरऑल सेहत को भी मजबूत बनाते हैं।
कुछ लोगों को इस मामले में ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होती है, खासकर डायबिटीज के मरीज, बहुत ज्यादा पसीना बहाने वाले, बार-बार डायरिया से जूझने वाले और हाई बीपी की दवाएं लेने वाले लोग। ऐसे में छोटी-छोटी लापरवाहियां आगे चलकर बड़ी परेशानी का कारण बन सकती हैं। समय रहते संकेतों को पहचानना और संतुलित आहार अपनाना ही पोटैशियम की कमी से बचाव का सबसे आसान और सुरक्षित तरीका है।