पोर्न की आदत से जूझ रहे हैं? समझ, संतुलन और सही मदद से निकल सकता है रास्ता

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32 वर्ष के एक आईटी प्रोफेशनल का सवाल आज डिजिटल दौर की एक आम लेकिन कम चर्चा होने वाली समस्या को सामने लाता है। उनका कहना है कि उन्हें पोर्न देखने की आदत लग गई है। बिना देखे नींद नहीं आती, रिश्तों में दूरी बढ़ रही है और वे महसूस करते हैं कि वे भावनात्मक रूप से “प्रेजेंट” नहीं रह पाते। उन्हें अपनी कंपनी किसी भी पार्टनर से ज्यादा सहज लगती है। अब सवाल यह है—क्या यह सामान्य है, और इससे बाहर कैसे निकला जाए?

सबसे पहले एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। पोर्न देखना अपने आप में हमेशा समस्या नहीं होता। दुनिया भर में बहुत बड़ी संख्या में लोग कभी-कभी पोर्न देखते हैं और उनके जीवन या रिश्तों पर इसका नकारात्मक असर नहीं पड़ता। समस्या तब शुरू होती है जब यह व्यवहार कंपल्सिव हो जाए, छुपाकर किया जाने लगे, अपराध-बोध या शर्म से जुड़ जाए और वास्तविक रिश्तों, इंटिमेसी और आत्मसम्मान पर असर डालने लगे।

अक्सर लोग “पोर्न एडिक्शन” शब्द का उपयोग करते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह कई बार सतही लेबल होता है। असली मुद्दा अक्सर कहीं और होता है—अकेलापन, तनाव, भावनात्मक खालीपन, अस्वीकृति का डर, यौन असुरक्षा या रिश्तों में संवाद की कमी। पोर्न कई लोगों के लिए एक “कोपिंग मैकेनिज्म” यानी तनाव से निपटने का तरीका बन जाता है। दिक्कत तब होती है जब यही एकमात्र तरीका रह जाता है।

जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक और अत्यधिक मात्रा में पोर्न देखता है, तो दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम प्रभावित हो सकता है। डोपामिन आधारित उत्तेजना की आदत पड़ने से वास्तविक जीवन की इंटिमेसी अपेक्षाकृत कम रोमांचक लगने लगती है। इससे अवास्तविक अपेक्षाएं भी बन सकती हैं, जो रिश्तों को कमजोर करती हैं।

अगर आप खुद से यह पूछें—क्या मैं कंट्रोल खो चुका हूं? क्या मैं इसे छुपाता हूं? क्या इससे मेरे रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं? क्या मैं अपराध-बोध महसूस करता हूं लेकिन फिर भी रुक नहीं पाता?—तो ये संकेत हो सकते हैं कि आपको इस पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।

समाधान “अचानक बंद कर देना” नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार पहला कदम है—अवेयरनेस। अपने उपयोग को ट्रैक करें। कब देखते हैं? किस मूड में? कौन सा ट्रिगर था—तनाव, अकेलापन, बोरियत या यौन निराशा? बिना जज किए सिर्फ अवलोकन करना ही बदलाव की शुरुआत है।

दूसरा कदम है—बिहेवियरल डिले। जब इच्छा हो, तो उसे तुरंत पूरा करने की बजाय 10 मिनट टालें। इस दौरान कोई वैकल्पिक गतिविधि करें—टहलना, ठंडा पानी पीना, दोस्त को मैसेज करना या सांस पर ध्यान देना। कई बार इच्छा की तीव्रता खुद ही कम हो जाती है।

तीसरा कदम है—भावनात्मक कारणों पर काम करना। अगर समस्या यौन निराशा है, तो पार्टनर से ईमानदार बातचीत जरूरी है। अगर अकेलापन है, तो सामाजिक जुड़ाव बढ़ाना मददगार हो सकता है। अगर शर्म या अपराध-बोध है, तो खुद के प्रति करुणा विकसित करना जरूरी है। अपने आप को दोष देने से लूप और मजबूत होता है।

कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) इस तरह के पैटर्न को समझने और बदलने में बेहद प्रभावी मानी जाती है। यह अवास्तविक विचारों को पहचानने, नए कोपिंग टूल्स विकसित करने और ट्रिगर्स से निपटने में मदद करती है। अगर आपको लगता है कि आप चाहकर भी खुद को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, या पोर्न ने वास्तविक इंटिमेसी की जगह ले ली है, तो प्रोफेशनल मदद लेना बिल्कुल उचित कदम है—यह कमजोरी नहीं, परिपक्वता का संकेत है।

चार सप्ताह का एक सरल सेल्फ-रेगुलेशन प्लान अपनाया जा सकता है—पहले सप्ताह अवलोकन, दूसरे में व्यवहार को थोड़ी देर टालना, तीसरे में असली जरूरतों पर काम करना और चौथे में संतुलित सीमाएं तय करना। लक्ष्य “शुद्ध” बनना नहीं है, बल्कि सचेत, संतुलित और ईमानदार बनना है।

सबसे महत्वपूर्ण बात—शर्म को छोड़िए। समस्या को नैतिक विफलता की तरह न देखें। अक्सर यह अधूरी भावनात्मक जरूरतों, संवाद की कमी या तनाव का संकेत होता है। जब असली कारणों पर काम किया जाता है, तो व्यवहार अपने आप संतुलित होने लगता है।

आप अकेले नहीं हैं। डिजिटल युग में यह संघर्ष आम है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग इसे स्वीकार कर मदद लेने की हिम्मत करते हैं। और वही बदलाव की शुरुआत है।

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