Mental Health Tips: दिनभर ऑफिस के काम में व्यस्त रहने के बाद रात में जैसे ही बिस्तर पर जाएं और दिमाग में दिनभर की घटनाएं घूमने लगें, तो यह अनुभव कई लोगों के लिए परेशान करने वाला हो सकता है। अधूरे काम, बॉस की कही बातें, अगले दिन की चिंता, पुरानी घटनाएं और भविष्य को लेकर डर—इन सबके कारण कई बार नींद आने में दो-तीन घंटे तक लग सकते हैं।
क्या यह सिर्फ स्ट्रेस है या किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का संकेत? इस सवाल पर डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके तथा यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर, बताते हैं कि रात में विचारों का बढ़ जाना आम अनुभव है। हालांकि, जब यह लगातार नींद और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तब इसे गंभीरता से लेना जरूरी है।
दिन में व्यस्त, रात में क्यों एक्टिव हो जाता है दिमाग?
पूरे दिन ईमेल, मीटिंग, फोन कॉल, डेडलाइन और अलग-अलग फैसलों के बीच दिमाग लगातार काम करता रहता है। दिन में व्यस्तता के कारण कई विचारों पर ध्यान देने का मौका नहीं मिलता।
रात में जब काम और बाहरी गतिविधियां शांत होती हैं, तब वही विचार एक-एक करके दिमाग में वापस आने लगते हैं। इसी वजह से शरीर थका होने के बावजूद मन शांत नहीं हो पाता।
रात में दिमाग के ज्यादा सक्रिय रहने के पीछे रुमिनेशन और चिंता प्रमुख कारण हो सकते हैं।
पुरानी बातों को बार-बार दोहराना है रुमिनेशन
रुमिनेशन यानी किसी पुरानी घटना, बातचीत या गलती के बारे में बार-बार सोचना। उदाहरण के तौर पर—
- बॉस ने ऐसा क्यों कहा?
- मीटिंग में मैंने वह बात क्यों बोल दी?
- कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई?
- उस समय मुझे कुछ और कहना चाहिए था?
इस तरह के सवालों का कोई स्पष्ट समाधान नहीं मिलता, लेकिन दिमाग इन्हें बार-बार दोहराता रहता है।
भविष्य की आशंकाओं को लेकर चिंता
दूसरी तरफ चिंता में दिमाग आने वाले समय की संभावित समस्याओं के बारे में लगातार सोचता है, जैसे—
- अगर कल काम पूरा नहीं हुआ तो?
- बॉस नाराज हो गए तो क्या होगा?
- अगर कुछ गलत हो गया तो?
- मेरी नौकरी का भविष्य कैसा रहेगा?
रुमिनेशन और चिंता दोनों मिलकर दिमाग को लंबे समय तक सक्रिय रख सकते हैं। इनका संबंध एंग्जाइटी, डिप्रेशन और इंसोम्निया जैसी स्थितियों से देखा जा सकता है। हालांकि, सिर्फ ज्यादा सोचना अपने आप में किसी मानसिक बीमारी का प्रमाण नहीं है।
विचारों को जबरदस्ती रोकने की कोशिश न करें
अगर कोई आपसे कहे कि अगले एक मिनट तक गुलाबी हाथी के बारे में बिल्कुल मत सोचिए, तो संभव है कि आपके दिमाग में सबसे पहले वही तस्वीर आए। विचारों को दबाने की कोशिश कई बार उल्टा असर कर सकती है।
रात में भी जब हम खुद से कहते हैं, “मुझे बिल्कुल नहीं सोचना है, मुझे अभी सोना ही है,” तो दिमाग उसी विचार पर नजर रखने लगता है।
इसलिए विचारों से लड़ने के बजाय उन्हें पहचानना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। खुद से कहें—
“मेरे दिमाग में यह विचार आया है। मुझे इसे अभी हल करने की जरूरत नहीं है।”
क्या हर बार ज्यादा सोचना OCD होता है?
नहीं। सिर्फ बार-बार विचार आने या ओवरथिंकिंग होने का मतलब OCD यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर होना नहीं है।
OCD में व्यक्ति को बार-बार परेशान करने वाले और अनचाहे विचार आ सकते हैं। इन विचारों से राहत पाने या खुद को आश्वस्त करने के लिए व्यक्ति कुछ काम बार-बार कर सकता है। इन्हें कंपल्शन कहा जाता है।
फिजिकल कंपल्शन
इसमें व्यक्ति बार-बार हाथ धो सकता है, ताला चेक कर सकता है, चीजों को किसी खास तरीके से व्यवस्थित कर सकता है या किसी चीज को बार-बार जांच सकता है।
मेंटल कंपल्शन
हर कंपल्शन बाहर से दिखाई नहीं देता। कुछ लोग मन ही मन गिनती करते हैं, शब्द या प्रार्थना दोहराते हैं, किसी पुरानी घटना को बार-बार याद करके जांचते हैं या अपनी भावनाओं का लगातार विश्लेषण करते रहते हैं।
इन गतिविधियों से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन बाद में वही संदेह और बेचैनी दोबारा लौट सकती है।
ओवरथिंकिंग और OCD में कैसे करें अंतर?
पिछले दो हफ्तों के अनुभव को ध्यान में रखकर अपने लक्षणों का आकलन किया जा सकता है। ऐसे सेल्फ-असेसमेंट टूल शुरुआती संकेत समझने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इनके आधार पर खुद से OCD या किसी अन्य मानसिक बीमारी का निदान नहीं करना चाहिए।
दिए गए आकलन के अनुसार, सेक्शन A में 9 या उससे अधिक स्कोर ओवरस्टिमुलेशन और रुमिनेशन की समस्या की ओर संकेत कर सकता है।
वहीं सेक्शन B में सवाल 8 और 10 पर 2 या 3 अंक OCD से जुड़े लक्षणों की ओर संकेत कर सकते हैं।
ऐसे परिणाम आने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
कब समझें कि नींद की समस्या गंभीर हो रही है?
इनमें से कोई स्थिति लगातार बनी हुई है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए—
- नींद आने में बहुत ज्यादा समय लगना।
- रात में बार-बार नींद खुलना।
- सुबह जरूरत से पहले नींद खुल जाना।
- अगले दिन थकान, ध्यान या काम करने की क्षमता प्रभावित होना।
ऐसी स्थिति में 14 दिन की स्लीप डायरी बनाना मददगार हो सकता है। इसमें रोजाना लिखें—
- कितने बजे बिस्तर पर गए।
- कितने बजे उठे।
- नींद आने में कितना समय लगा।
- रात में कितनी बार नींद खुली।
- दिन में झपकी ली या नहीं।
- चाय-कॉफी कब और कितनी ली।
- शाम को स्क्रीन पर कितना समय बिताया।
- अगले दिन ऊर्जा और एकाग्रता कैसी रही।
अगर नींद की परेशानी तीन महीने या उससे ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो लंबे समय के इंसोम्निया की संभावना पर डॉक्टर से चर्चा करनी चाहिए।
इसके अलावा समस्या की वजह केवल तनाव नहीं होती। डॉक्टर जरूरत के मुताबिक कैफीन, दवाओं, थायरॉइड, दर्द, हार्मोनल बदलाव, डिप्रेशन, एंग्जाइटी और शिफ्ट वर्क जैसी वजहों पर भी विचार कर सकते हैं।
अगर तेज खर्राटे आते हैं, सोते समय सांस रुकती है या घुटन के साथ नींद खुलती है, तो स्लीप एप्निया की जांच भी जरूरी हो सकती है।
रात में दिमाग शांत करने के 6 आसान तरीके
1. सोने से करीब 2 घंटे पहले काम समेटें
ऑफिस का काम खत्म करते समय अगले दिन के लिए छोटी-सी सूची बना लें—
- आज क्या पूरा हुआ?
- क्या अधूरा रह गया?
- कल सबसे पहले क्या करना है?
काम लिख देने से दिमाग को यह भरोसा मिल सकता है कि जरूरी चीजें भूली नहीं गई हैं।
2. सोने से पहले 45-60 मिनट शांत रहें
इस दौरान ऑफिस का काम, ईमेल और बहुत ज्यादा उत्तेजित करने वाली स्क्रीन गतिविधियों से दूरी रखें। इससे दिमाग को काम की स्थिति से आराम की स्थिति में आने का समय मिलेगा।
3. चिंता के लिए अलग समय तय करें
शाम को करीब 20 मिनट का समय अपनी चिंताओं को लिखने और उनके बारे में सोचने के लिए तय करें।
खुद से पूछें—“क्या इस समस्या को मैं अभी हल कर सकती हूं?”
अगर हां, तो अगला छोटा कदम तय करें। अगर यह केवल “अगर ऐसा हो गया तो?” जैसी आशंका है, तो उसे लिखकर फिलहाल छोड़ दें।
रात में खुद को याद दिलाएं—
“मैंने इस बात को लिख लिया है। इसे अभी हल करने की जरूरत नहीं है।”
4. विचार को रोकने के बजाय पहचानें
विचार आते ही खुद से कहें—
“मेरा दिमाग मीटिंग को दोबारा चला रहा है।”
या
“यह भविष्य को लेकर चिंता है।”
विचार को जबरदस्ती रोकने के बजाय उसे पहचानें और धीरे-धीरे ध्यान वर्तमान पर वापस लाएं।
5. बिस्तर को चिंता की जगह न बनने दें
जब नींद आने लगे तभी बिस्तर पर जाएं। अगर काफी देर तक नींद नहीं आती, तो उठकर हल्की रोशनी वाली जगह पर कोई शांत गतिविधि करें। नींद आने पर वापस बिस्तर पर जाएं।
बार-बार घड़ी देखने से भी नींद को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
6. नींद की बेसिक आदतों पर ध्यान दें
- रोज लगभग एक ही समय पर उठें।
- सुबह प्राकृतिक रोशनी लें।
- दिन में नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
- सोने से करीब 6 घंटे पहले कैफीन बंद कर दें।
- रात में भारी भोजन और निकोटिन से बचें।
- नींद के लिए शराब का सहारा न लें।
- कमरे को शांत, अंधेरा और आरामदायक रखें।
- दिन में लंबे समय तक झपकी लेने से बचें।
कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर नींद की परेशानी लगातार बनी हुई है, कई महीनों से चल रही है या इसका असर काम, रिश्तों, ऊर्जा और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है, तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह लेना उचित है।
आखिर में एक्सपर्ट की सलाह
रात में दिमाग को पूरी तरह खाली कर देना जरूरी नहीं है और न ही हर विचार को खत्म करना संभव है। लक्ष्य यह सीखना है कि हर विचार को पकड़कर उसका विश्लेषण करना जरूरी नहीं है।
विचार आएं तो उन्हें पहचानें, उनसे लड़ने के बजाय उन्हें गुजरने दें और अपना ध्यान धीरे-धीरे वर्तमान में वापस लाएं।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। सेल्फ-असेसमेंट किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का पक्का निदान नहीं है। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लें।