यूपी के अमरोहा से सामने आई 11वीं की छात्रा की मौत की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। लगातार फास्टफूड खाने की आदत ने उस बच्ची के पाचन तंत्र को इस कदर नुकसान पहुंचाया कि आंतें आपस में चिपक गईं और आखिरकार उसकी जान चली गई। दिल्ली एम्स में चले इलाज के बाद डॉक्टरों ने साफ कहा कि जरूरत से ज्यादा जंक फूड ही इस भयावह स्थिति की जड़ बना। यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की खाने की आदतों पर बड़ा सवाल है।
असल में भोजन हमारे शरीर के लिए ईंधन जैसा होता है। जैसे किसी गाड़ी में मिलावटी पेट्रोल-डीजल डाल दिया जाए तो इंजन धीरे-धीरे खराब हो जाता है, ठीक वैसे ही फास्टफूड शरीर के लिए मिलावटी ईंधन है। बाहर से स्वादिष्ट दिखने वाला यह खाना अंदर ही अंदर शरीर को कमजोर करता रहता है और एक दिन सिस्टम पूरी तरह जवाब दे देता है।
ज्यादातर फास्टफूड मैदे से बने होते हैं, जिनमें जरूरत से ज्यादा नमक, शुगर और पाम ऑयल होता है। इनमें स्वाद तो बहुत होता है, लेकिन पोषण लगभग न के बराबर। ये चीजें छोटी आंत में बहुत तेजी से पच जाती हैं, जिससे दिमाग को तुरंत खुशी का सिग्नल मिलता है। यही वजह है कि बार-बार जंक फूड खाने का मन करता है। लेकिन इसके साथ ही ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है और पैंक्रियाज को बार-बार ज्यादा इंसुलिन बनानी पड़ती है। वहीं दूसरी तरफ बड़ी आंत के अच्छे बैक्टीरिया फाइबर की कमी से भूखे रह जाते हैं, जिससे पाचन बिगड़ने लगता है।
दिमाग पर इसका असर यह होता है कि ज्यादा शुगर, नमक और फैट मिलते ही डोपामिन रिलीज होता है और ब्रेन इसे इनाम समझ लेता है। यह खुशी कुछ देर की होती है, लेकिन इसकी आदत लग जाती है। इसोफेगस यानी फूड पाइप में फास्टफूड एसिडिटी और जलन बढ़ाता है। बार-बार एसिड रिफ्लक्स होने से सीने में जलन, खट्टी डकारें और निगलने में दिक्कत शुरू हो जाती है।
पैंक्रियाज पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ता है क्योंकि उसे बार-बार बढ़े हुए ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन बनानी पड़ती है। लंबे समय तक ऐसा होने पर शरीर इंसुलिन की बात मानना कम कर देता है, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। यही आगे चलकर प्रीडायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज की वजह बनता है।
लिवर, जो शरीर का फिल्टर है, फास्टफूड से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। ज्यादा फैट और शुगर की वजह से लिवर में फैट जमा होने लगता है और फैटी लिवर जैसी गंभीर समस्या पैदा हो जाती है। छोटी आंत में फास्टफूड बहुत जल्दी पच जाता है, लेकिन पोषण नहीं देता। इससे आंतों की परत कमजोर होती है, गैस, सूजन और लगातार थकान रहने लगती है।
बड़ी आंत में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया का खाना फाइबर होता है, जो फास्टफूड में नहीं के बराबर होता है। नतीजा यह कि गट हेल्थ बिगड़ती है और इम्यूनिटी कमजोर पड़ जाती है। किडनी पर भी फास्टफूड का भारी असर पड़ता है। ज्यादा नमक से शरीर में पानी रुकता है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है और किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। लंबे समय तक ऐसा चलता रहा तो किडनी डैमेज का खतरा बढ़ जाता है।
इसके उलट अगर डाइट में खूब सब्जियां शामिल की जाएं तो शरीर खुद को रिपेयर करने लगता है। फाइबर, विटामिन और मिनरल्स से पाचन सुधरता है, इम्यूनिटी मजबूत होती है और वजन कंट्रोल में रहता है। पालक और ब्रॉकली दिमाग को स्थिर ऊर्जा देती हैं, लौकी और तोरई इसोफेगस की जलन कम करती हैं, करेला और गाजर पैंक्रियाज को राहत देते हैं, चुकंदर और पालक लिवर को डिटॉक्स करते हैं। भिंडी और पत्तागोभी बड़ी आंत के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाती हैं, जबकि लौकी और खीरा किडनी पर नमक का असर कम करते हैं।
यह मामला एक कड़वी सच्चाई की याद दिलाता है कि स्वाद के चक्कर में हम धीरे-धीरे अपनी सेहत को खो रहे हैं। फास्टफूड तात्कालिक खुशी देता है, लेकिन लंबे समय में शरीर से बहुत बड़ी कीमत वसूल करता है। अब वक्त है कि हम प्लेट में बदलाव करें, वरना नुकसान सिर्फ आदत का नहीं, जिंदगी का भी हो सकता है।