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रोज 6-7 घंटे गेम खेलना पड़ रहा भारी? जानिए गेमिंग एडिक्शन से बाहर निकलने का वैज्ञानिक तरीका

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ऑनलाइन गेमिंग आज युवाओं के बीच मनोरंजन का एक लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। लेकिन जब गेम खेलना शौक से बढ़कर आदत और फिर लत में बदल जाए, तब यह पढ़ाई, करियर, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। यदि कोई व्यक्ति रोज 6-7 घंटे या उससे अधिक समय गेमिंग में बिताता है, पढ़ाई प्रभावित हो रही है, नींद खराब हो रही है और परिवार या दोस्तों से दूरी बढ़ रही है, तो यह केवल टाइमपास नहीं बल्कि एक गंभीर चेतावनी हो सकती है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, जब व्यक्ति गेम न खेलने पर बेचैनी, चिड़चिड़ापन या खालीपन महसूस करने लगे और नुकसान जानने के बावजूद गेमिंग जारी रखे, तो इसे प्रॉब्लमैटिक गेमिंग या कुछ मामलों में गेमिंग डिसऑर्डर माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक वास्तविक समस्या के रूप में मान्यता दी है।

गेमिंग की लत का सबसे बड़ा कारण हमारे दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम है। जब कोई खिलाड़ी नया लेवल पार करता है, रैंक बढ़ती है या कोई मिशन पूरा होता है, तब दिमाग में डोपामिन नामक रसायन रिलीज होता है। यह व्यक्ति को खुशी और उपलब्धि का अनुभव कराता है। धीरे-धीरे दिमाग उसी अनुभव को बार-बार पाने की इच्छा करने लगता है और गेमिंग का समय बढ़ता जाता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि शुरुआत में व्यक्ति कुछ मिनट या एक-दो घंटे गेम खेलता है, लेकिन समय के साथ वही आनंद पाने के लिए अधिक समय खर्च करना पड़ता है। परिणामस्वरूप पढ़ाई, करियर, नींद और सामाजिक जीवन प्रभावित होने लगते हैं। कई युवाओं को यह महसूस भी होता है कि वे अपनी आदत पर नियंत्रण खो चुके हैं, लेकिन फिर भी गेमिंग छोड़ना आसान नहीं लगता।

यदि गेम न खेलने पर गुस्सा, चिड़चिड़ापन, बेचैनी या उदासी महसूस होती है, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि दिमाग गेमिंग से मिलने वाले लगातार रोमांच का आदी हो चुका है। ऐसे में केवल इच्छाशक्ति के भरोसे गेमिंग छोड़ने की कोशिश कई बार सफल नहीं होती। इसके लिए व्यवस्थित योजना और व्यवहार में बदलाव की जरूरत होती है।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि गेमिंग को अचानक पूरी तरह बंद करने की बजाय धीरे-धीरे कम किया जाए। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आप कब और क्यों गेम खेलते हैं। क्या आप बोरियत दूर करने के लिए खेलते हैं? तनाव कम करने के लिए? अकेलेपन से बचने के लिए? या पढ़ाई और जिम्मेदारियों से भागने के लिए? इन कारणों को पहचानना सुधार की दिशा में पहला कदम है।

गेमिंग का समय लिखने के लिए एक डायरी बनाना भी उपयोगी हो सकता है। इसमें यह दर्ज करें कि आपने कब गेम खेला, कितनी देर खेला और उस समय आपकी मानसिक स्थिति कैसी थी। इससे आपको अपने व्यवहार के पैटर्न समझने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि खाली समय को दूसरी सकारात्मक गतिविधियों से भरना भी जरूरी है। खेलकूद, जिम, संगीत, नई स्किल सीखना, दोस्तों से मिलना या किसी रचनात्मक शौक को अपनाना दिमाग को वैकल्पिक रिवॉर्ड प्रदान करता है और गेमिंग की निर्भरता कम करने में मदद करता है।

इसके साथ ही मोबाइल और कंप्यूटर पर आने वाले गेम नोटिफिकेशन बंद करना, रात में डिवाइस को बेडरूम से बाहर रखना और पढ़ाई व गेमिंग के लिए अलग-अलग स्थान तय करना भी प्रभावी कदम साबित हो सकते हैं।

परिवार का सहयोग भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी युवा को महसूस हो रहा है कि गेमिंग उसकी जिंदगी को प्रभावित कर रही है, तो उसे अपने माता-पिता या करीबी लोगों से खुलकर बात करनी चाहिए। डांट-फटकार की बजाय सहयोग और समझदारी इस समस्या से बाहर निकलने में ज्यादा मददगार साबित होती है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यदि गेमिंग की वजह से पढ़ाई या नौकरी पर गंभीर असर पड़ रहा हो, नींद लगातार खराब हो रही हो, अवसाद या चिंता के लक्षण दिखाई दे रहे हों या आत्महत्या जैसे विचार आने लगें, तो तुरंत किसी मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक से संपर्क करना चाहिए। ऐसे मामलों में कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) जैसी तकनीकें काफी प्रभावी मानी जाती हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गेमिंग एडिक्शन कोई चरित्र की कमजोरी नहीं बल्कि एक व्यवहारिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या हो सकती है। सही रणनीति, परिवार के सहयोग और पेशेवर मार्गदर्शन की मदद से इससे बाहर निकलना पूरी तरह संभव है। धीरे-धीरे छोटे कदम उठाकर कोई भी व्यक्ति अपनी जिंदगी पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर सकता है और पढ़ाई, करियर तथा व्यक्तिगत जीवन में संतुलन वापस ला सकता है।

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