भारतीयों में मोटापे का जेनेटिक जोखिम ज्यादा, लेकिन लाइफस्टाइल से घट सकता है खतरा

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हर साल 4 मार्च को मनाया जाने वाला World Obesity Day दुनिया भर में बढ़ती मोटापे की समस्या पर ध्यान केंद्रित करता है। यह सिर्फ एक जागरूकता दिवस नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य के बीच संतुलन की जरूरत को याद दिलाने का अवसर भी है। मोटापा आज बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग को प्रभावित कर रहा है और इसके कारण मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और अन्य क्रॉनिक बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।

World Health Organization (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार 2022 में दुनिया में हर आठ में से एक व्यक्ति मोटापे से जूझ रहा था। 18 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 2.5 अरब वयस्क अधिक वजन के थे, जिनमें से करीब 89 करोड़ मोटापे से ग्रस्त थे। किशोरों और बच्चों में भी मोटापे के मामले तेजी से बढ़े हैं, जो आने वाले वर्षों में गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन सकते हैं।

भारत में स्थिति भी चिंताजनक होती जा रही है। हालिया राष्ट्रीय सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि पिछले एक दशक में वयस्कों में मोटापे की दर लगातार बढ़ी है। बॉडी मास इंडेक्स (BMI) 25 से अधिक होने पर व्यक्ति को ओवरवेट और 30 से अधिक होने पर मोटापे की श्रेणी में रखा जाता है। शहरीकरण, प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन और शारीरिक गतिविधि में कमी इस बढ़ते खतरे के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

हैदराबाद स्थित Asian Institute of Gastroenterology (AIG) के विशेषज्ञों द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि भारतीयों में मोटापे की जेनेटिक प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, 40 से 70 प्रतिशत तक मोटापे का जोखिम आनुवांशिक कारकों से जुड़ा हो सकता है। कुछ जीन ऐसे होते हैं जो जन्म से ही व्यक्ति को अधिक वजन की ओर प्रवृत्त कर सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि परिणाम तय है।

एआईजी हॉस्पिटल्स के चेयरमैन डॉ. डी. नागेश्वर रेड्डी के अनुसार, भारतीयों में मोटापा जेनेटिक्स, आहार और मेटाबोलिक कारकों के संयोजन से विकसित होता है। खासकर 30 वर्ष से कम आयु के युवाओं में यदि खराब लाइफस्टाइल और मोटापा बढ़ाने वाले जीन दोनों मौजूद हों, तो मोटे होने की आशंका कई गुना तक बढ़ सकती है।

हालांकि विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि जेनेटिक्स को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। कम उम्र से संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और सक्रिय दिनचर्या अपनाने से मेटाबोलिक प्लास्टिसिटी बेहतर रहती है, जिससे मोटापे से जुड़े जीन का असर काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और सैचुरेटेड फैट का कम सेवन, पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर युक्त आहार, साथ ही नियमित फिजिकल एक्टिविटी मोटापे की जड़ पर प्रभावी प्रहार कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का संदेश साफ है—जेनेटिक्स किस्मत नहीं है। सही खान-पान और अनुशासित जीवनशैली अपनाकर मोटापे के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जागरूकता, शुरुआती हस्तक्षेप और सामूहिक प्रयास ही इस बढ़ती चुनौती का दीर्घकालिक समाधान बन सकते हैं।

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